जादुई वरदान | JADUI VARDAN | Jadui Kahani | Magical Story | Jadui Wali Kahani | Jadui Stories in Hindi

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हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” जादुई वरदान ” यह एक Magical Story है। अगर आपको Hindi Magical Stories, Jadui Kahani या Achhi Achhi Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।


बहुत समय पहले की बात है, रायगढ़ में अचानक से चिड़ियों का दिखना कम होने लगता है।

उस नगर में रहने वाले लोग पक्षियों से बहुत प्यार करते थे।

वे रोज अपने घर के बाहर चिड़ियों के लिए दाना-पानी रखते, लेकिन अचानक चिड़ियों के कम होने से वह सब परेशान थे।

किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि चिड़िया आखिर चली कहां गई। नगर में रहने वाला रांझू अपने मित्र स्वर्ण से कहता है।

रांझू, “भाई! हमारा नगर तो जैसे खाली होता जा रहा है यार।”

स्वर्ण, “सही कहा तुमने! चिड़ियों की आवाज से मन खुश होता है, उन्हें देखकर अजीब सी खुशी मिलती है यार। अब तो नगर के बच्चे भी ज्यादा खेलते नहीं दिखते।”

रांझू, “हां! पहले सारा दिन यह बच्चे चिड़ियों के साथ इधर-उधर भागते थे, अब तो बच्चे उदास हो गए हैं।”

स्वर्ण, “हां भाई! आजकल तो नगर में हर तरफ यही चर्चा है कि अचानक से चिड़िया कहां चली गई।”

भोला, “हम सबको जो है कुछ करना चाहिए भाई।”

रांझू, “भोला! हम क्या कर सकते हैं तुम बताओ? अगर तुम्हें कुछ समझ आ रहा है तो।”

भोला, “अभी तो मेरे पास तुम्हारी बात का कोई जवाब नहीं है भैया! लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूं कि कुछ ना कुछ तो करना ही होगा।”

भोला एक मजदूर था, वह पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ अपना काम करता था। साथ ही वह बहुत दयालु भी था।

नगर से चिड़ियों का गायब होना उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। रात को भोला अपनी मां से कहता है।

भोला, “मां! मैं दूसरे नगर में काम की तलाश में जा रहा हूं। अगर कोई काम मिल गया तो मुझे वापस आने में समय लग सकता है। इसीलिए जो है तुम अपना ध्यान रखना।”

मां, “अच्छा बेटा! तू यही कोई काम क्यों नहीं ढूंढ लेता? बार-बार दूसरे नगर काम के लिए जाता है, कितने-कितने दिन वापस नहीं आता।”

भोला, “मां! मैं तो अभी कम उम्र का हूं, दूसरे नगर जा सकता हूं। लेकिन हमारे नगर में जो ज्यादा उम्र के लोग हैं वह दूसरे नगर नहीं जा सकते।

अगर हम कम उम्र वाले दूसरे नगर में काम करने चले जाएं, तो हमारे नगर में अधिक उम्र के लोगों के लिए ज्यादा काम होगा। समझी?”

मां, “बेटा! तू दूसरों के बारे में कितना सोचता है।”

भोला, “मां! तुमने ही सिखाया है, हमेशा खाने से पहले यह जरूर पता कर लो कि तुम्हारे पड़ोस में रहने वालों ने खाना खाया है या नहीं।”

मां, “हां ठीक है, ठीक है। मैं कल सुबह तुम्हारी यात्रा के लिए कुछ खाने का सामान बांध दूंगी।”

दूसरे दिन भोला अपनी यात्रा के लिए जल्दी ही निकल पड़ता है। दूसरे नगर में उसे नया काम मिल जाता है।

लेकिन दूसरी तरफ रायगढ़ में धीरे-धीरे चिड़ियों ने आना बंद कर दिया था। दूसरी तरफ कुछ समय बाद भोला दूसरे नगर से वापस आने के लिए निकलता है।

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रास्ते में एक जंगल पड़ता था। भोला खुशी-खुशी अपने नगर की ओर तेजी से बढ़ रहा होता है, तभी अचानक उसे एक बूढ़े बाबा दिखते हैं।

बूढ़े बाबा, “बेटा! जरा रुको, मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है।”

भोला, “आपको क्या कष्ट है बाबा?”

बूढ़े बाबा, “बेटा! तुम्हें देखकर ऐसा लग रहा है कि इस संसार का कोई भी दुख तुम्हें नहीं है। क्या तुम मुझे इसका कारण बता सकते हो कि तुम इतने खुश कैसे हो?”

भोला, “बाबा! मेरे पास ईश्वर का दिया सब कुछ है। ईश्वर ने मुझे स्वस्थ बनाया है, मेहनत करके अपना

और अपने परिवार का पेट जो है पाल सकता हूं। फिर भला मुझे दुख और चिंता क्यों हो?”

बूढ़े बाबा, “सही कहा बेटा! लेकिन मैं तो बूढ़ा हूं, मैं ना मेहनत कर सकता हूं और ना ही कमा सकता हूं।”

भोला, “बाबा! आपको क्या मदद चाहिए मुझे बताइए।”

बूढ़े बाबा, “बेटा! तुमने सही कहा तुम स्वस्थ हो और मेहनती भी हो, तुम कमा सकते हो।

लेकिन मैं कमा नहीं सकता हूं। क्या तुम मुझे कुछ पैसे देकर मेरी मदद करोगे?”

भोला, “जी बाबा! जरूर करूंगा। यह लीजिए, मैंने पिछले एक महीने में जितना कमाया है सब आप रख लीजिए।”

बूढ़े बाबा, “बेटा! यदि तुम यह सारा धन मुझे दे दोगे तो तुम्हारे पास क्या बचेगा?”

भोला, “बाबा! मेरे पास फिर से मेरा शरीर बचेगा, जिससे मैं दोबारा मेहनत करके पैसे कमा लूंगा।”

बूढ़े बाबा, “बेटा! तुम्हारा हृदय सच में बहुत बड़ा है। तुम बहुत दयालु हो। मैं तुम्हें दो वरदान देना चाहता हूं, मांगो तुम्हें क्या चाहिए।”

भोला, “आप कौन हैं बाबा?”

तभी बूढ़े बाबा एक देवता के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।

वन देवता, “बेटा! मैं इस जंगल का वन देवता हूं और मैं इस जंगल से गुजरने वाले लोगों की हमेशा परीक्षा लेता हूं।

आज मेरी परीक्षा में तुम पास हो गए हो, इसलिए मैं तुम्हें वरदान देना चाहता हूं। तुम मुझसे कोई भी दो वरदान मांग सकते हो।”

भोला, “अगर आप सचमुच में प्रसन्न हैं, तो आप मुझे एक ऐसा गुलेल दें जिसका निशाना जो है कभी ना चूके।”

वन देवता, “यह लो बेटा तुम्हारी गुलेल! इसका निशाना कभी नहीं चूके। अब तुम अपना दूसरा वरदान मांगो।”

भोला, “मुझे जो है अपने दूसरे वरदान में एक ऐसी बीन चाहिए जिसकी धुन सुनते ही लोग नाचने लगें।”

वन देवता, “लो बेटा! इस बीन की आवाज सुनने वाले तुरंत नाचने लगेंगे। और तुम इसे जितनी तेजी से बजाओगे, लोग उतनी तेजी से नाचेंगे।

बेटा! तुम मुझसे वरदान में सोना-चांदी, रुपए-पैसे भी तो मांग सकते थे।”

भोला, “बाबा! सोना-चांदी तो मैं अपनी मेहनत से भी कमा सकता हूं। लेकिन वरदान में मिली हुई यह चीज मैं जो है अपनी मेहनत से नहीं कमा सकता हूं।”

वन देवता वहां से गायब हो जाते हैं। भोला खुशी-खुशी अपने घर की तरफ बढ़ने लगता है। एक दिन घर पर।

मां, “भोला! बेटा जल्दी से आकर रोटी खा ले, वरना तुझे काम के लिए देर हो जाएगी।

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बेटा! जैसे तुझे लगता है तेरे पक्षी भूखे होंगे, वैसे ही मुझे लगता है मेरा बच्चा भूखा होगा।”

भोला, “मां! तुम भी कैसी बातें करती हो। मैं तो बोल सकता हूं, लेकिन यह बेचारे तो अपनी भूख और प्यास हमें बोलकर नहीं बता सकते। सिर्फ चू-चू करते रहते हैं।”

मां, “अच्छा बाबा! पहले तू अपने पक्षियों को दाना-पानी दे, फिर मैं अपने पक्षी मतलब तुझे रोटी देती हूं।”

एक दिन भोला अपने काम की तलाश में बाजार के चौक पर खड़ा होता है, तभी उसकी नजर वहां खड़ी मूर्ति पर पड़ती है, जिसके पास पिंजरे में कई तरह के पक्षी कैद होते हैं।

भोला, “कितने सुंदर पक्षी हैं! और यह रंग-बिरंगा तोता तो बड़ा ही मन मोहने वाला है। न जाने क्यों यह आदमी इन पक्षियों को कैद करके रखता है।

मेरा बस चले तो मैं इस आदमी के सारे पक्षी खरीद लूं और उन्हें आजाद कर दूं। क्या करूं, मेरे पास इतने पैसे भी तो नहीं हैं।”

साहूकार, “भोला! आ गए तुम।”

भोला, “जी साहूकार जी! मैं आपका ही इंतजार कर रहा था। अब बताइए कहां काम करना है?”

साहूकार, “अब चलो मेरे साथ! मेरे घर पर ही कुछ काम है, लेकिन काम थोड़ा ज्यादा है तो शायद तुम्हें कुछ दिन वहां रुकना पड़े।”

भोला, “कोई बात नहीं साहूकार जी! मैं काम पूरा करके ही घर जाऊंगा, आप फिक्र मत कीजिए।”

साहूकार, “अच्छा! तुम्हारे रहने और खाने की व्यवस्था मैं वहीं पर करवा दूंगा।”

भोला, “आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।”

भोला साहूकार के घर में काम करना शुरू कर देता है। शाम को साहूकार का बेटा घर वापस आता है।

बेटा, “पिताजी! पिताजी! यह देखिए मुझे कितना सुंदर पक्षी मिला है।”

साहूकार, “हां बेटा! यह पक्षी तो सच में बड़ा ही सुंदर है। लेकिन तुम्हें यह पक्षी मिला कहां से?”

बेटा, “पिताजी! बाजार के चौक में एक आदमी पक्षियों को बेच रहा था, मैंने वहीं से इसे खरीदा है। अब यह मेरा हुआ।”

साहूकार, “वो तो ठीक है, लेकिन इसका ध्यान रखना। पिछली बार की तरह ऐसा ना हो कि यह भी बिना खाए-पिए मर जाए।”

साहूकार की पत्नी, “सही कहा आपने! ये हमेशा यही करता है। बाजार से नए-नए पक्षी लेकर आएगा, उन्हें दाना-पानी समय पर नहीं देता, फिर वे बेचारे भूख से तड़पकर मर जाते हैं।”

बेटा, “नहीं-नहीं! इस बार मैं पूरा ध्यान रखूंगा।”

भोला को पक्षियों के भूख से तड़पकर मरने की बात सुनकर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। दो-चार दिन बाद वह पक्षी भी मर गया।

भोला, “साहूकार जी! आपसे एक बात कहूं तो बुरा तो नहीं मानेंगे?”

साहूकार, “हां बोलो-बोलो भोला! क्या बात है?”

भोला, “आप अपने बेटे को समझाते क्यों नहीं? यह कितनी गलत बात है कि वह अपने शौक के लिए पक्षियों को कैद करके रखता है

और उनका ध्यान ना रखने की वजह से वह बेचारे अपने प्राण त्याग देते हैं।”

साहूकार, “क्या बताऊं भोला! हम तो खुद परेशान हैं, लेकिन यह लड़का है कि सुनता ही नहीं।”

बेटा, “ओ! तुम्हें क्या करना है? यह पक्षी मैंने पैसे देकर खरीदा था। यह जिंदा रहे या मर जाए,

इससे तुम्हें या किसी और को कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। समझे? तुम अपना काम करो और यहां से चलते बनो।”

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भोला उदास मन से अपना काम करता है और अपने घर आ जाता है। थोड़ी दूर जाने के बाद ही उसे एक व्यक्ति दिखा जो परेशान सा एक पेड़ के नीचे खड़ा था।

भोला, “मुझे लगता है इस व्यक्ति को मदद की जरूरत है। मुझे इसके पास जाना चाहिए।

सेठ जी! क्या बात है? आप परेशान लग रहे हैं। क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूं?”

मूर्ति, “हां भाई! तुम मेरी मदद जरूर कर सकते हो। मेरा नाम मूर्ति है और मैं चिड़ियों का व्यापारी हूं।

चिड़ियों को पकड़कर उन्हें बेचना मेरा काम है। ऊपर उस पेड़ पर कितनी सुंदर चिड़ियां बैठी हैं, मुझे उस चिड़िया को पकड़ना है।

अगर तुम मदद करोगे तो मैं तुम्हें मुंह मांगी कीमत दूंगा।”

भोला, “सेठ जी! अगर आप व्यापारी हैं तो आपके पास तो बहुत सारी चिड़ियां होंगी?”

मूर्ति, “हां! मेरे पास बहुत सारी चिड़ियां हैं। मैं रोज 100 से भी ज्यादा चिड़िया पकड़ता हूं और उन्हें दूसरे नगर में ले जाकर बेच देता हूं।”

भोला, “लेकिन सेठ जी! इतनी चिड़ियां का लोग करते क्या हैं?”

मूर्ति, “अरे तुम्हें नहीं पता! कोई चिड़िया को खाता है, कोई उसे पालता है। सबके अलग-अलग शौक हैं।

लेकिन मैंने आज तक इतनी सुंदर चिड़िया नहीं देखी। अब तुम देर मत करो और जल्दी से इस चिड़िया को पकड़कर मुझे दे दो।”

भोला, “ठीक है! अगर आप मुंह मांगी कीमत देंगे तो मैं अभी उस चिड़िया को नीचे गिराता हूं।”

भोला वन देवता की दी हुई गुलेल निकालता है और चिड़िया की तरफ बिना पत्थर लगाए निशाना लगा देता है। चिड़िया पेड़ से नीचे गिरती है।

भोला, “लीजिए सेठ जी! आपकी अद्भुत चिड़िया उस झाड़ी में है। जाइए उसे पकड़ लीजिए।”

मूर्ति, “हां-हां! मैं अभी उसे पिंजरे में बंद करता हूं।”

जैसे ही मूर्ति झाड़ी में घुसता है, भोला जादुई बीन बजाना शुरू कर देता है। बीन की धुन सुनते ही मूर्ति नाचने लगा।

मूर्ति, “अरे-अरे! मुझे क्या हो रहा है? अचानक से मेरा शरीर अपने आप नाचने के लिए बेचैन क्यों हो रहा है?”

मूर्ति का शरीर झाड़ियों में लगे कांटों से कटने लगा।

मूर्ति, “मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं! भगवान के लिए ये बीन की आवाज बंद करो।”

भोला बीन और जोर-जोर से बजाने लगता है। मूर्ति और तेजी से नाचने लगता है और लहूलुहान हो जाता है।

मूर्ति, “मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं! भगवान के लिए बजाना बंद कर दो। मेरे पास जितने पैसे हैं वो सब मैं तुम्हें दे दूंगा, लेकिन यह बीन बजाना बंद कर दो।”

भोला, “ठीक है सेठ जी! आप बाहर आ जाइए।”

सेठ किसी तरह झाड़ियों से बाहर निकलता है।

भोला, “अब मुझे सारे पैसे दे दो और मुझसे यह वादा करो कि तुम्हारे पास जितनी चिड़िया कैद हैं, उन सबको तुम आजाद कर दोगे।”

मूर्ति, “मैं ऐसा कैसे कर सकता हूं? अगर मैं चिड़िया नहीं पकडूंगा तो खाऊंगा क्या?”

भोला, “अगर तुम मेरी बात नहीं मानोगे, तो आज के बाद तुम्हें खाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। समझे?”

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मूर्ति, “तुम कहना क्या चाहते हो?”

भोला, “मैं फिर से बीन बजाना शुरू कर दूंगा और तुम जो है इन झाड़ियों में लगे कांटों से घायल होकर अपना दम तोड़ दोगे। अब बोलो तुम क्या करना चाहते हो?”

मूर्ति, “नहीं-नहीं-नहीं! तुम बीन मत बजाओ। मैं तुमसे वादा करता हूं कि मैं घर जाकर सारी चिड़ियां को आजाद कर दूंगा और फिर दोबारा कभी उन्हें नहीं पकडूंगा।”

भोला घर चला जाता है, लेकिन मूर्ति बदला लेने के लिए रायगढ़ के राजा के दरबार में पहुँच जाता है।

मूर्ति, “महाराज की जय हो! महाराज मेरा नाम मूर्ति है। महाराज! मैं तो बर्बाद हो गया। महाराज आपके राज्य में ऐसा अनर्थ हो रहा है।”

राजा, “क्या बात है? साफ-साफ बताओ।”

मूर्ति, “महाराज! आपके राज्य में मेरे कमाए हुए सोने के मोहरों को लूट लिया गया और मुझे बर्बाद कर दिया गया। आप उसे गिरफ्तार करिए और मुझे न्याय दिलाइए।”

राजा, “क्या नाम है उसका? बताओ।”

मूर्ति, “महाराज! मैं उसका नाम तो नहीं जानता लेकिन वह रायगढ़ नगर की तरफ ही आया है।

उसके पास एक गुलेल और बीन है जिसके बजने से शरीर अपने आप नाचने लगता है। वह एक जादुई बीन है।”

राजा, “ठीक है! तुम अपने घर जाओ और हम उस लुटेरे को पकड़वाने के बाद तुम्हें खबर करवा देंगे।”

महाराज अपने मंत्रियों को आदेश देते हैं और जल्द ही भोला को ढूंढकर पेश किया जाता है। मूर्ति को भी बुलाया जाता है।

भोला, “महाराज! मेरा क्या कसूर है?”

मूर्ति, “अपनी जुबान बंद करो! महाराज यही है वो दुष्ट। इसे तुरंत जेल में डलवा दीजिए। इसने ही मेरी जीवन भर की कमाई लूट ली।”

राजा, “क्या मूर्ति जो कह रहा है वह सच कह रहा है? तुमने इससे जबरदस्ती इसका सारा धन छीन लिया?”

भोला, “नहीं महाराज! यह झूठ बोल रहा है। इसने अपनी स्वेच्छा से सारा धन मुझे दिया था।”

मूर्ति, “नहीं महाराज! यह झूठ बोल रहा है।”

मंत्री, “महाराज! इस भोला के घर की तलाशी में यह गुलेल, बीन और सोने के सिक्कों की पोटली मिली है।”

मूर्ति, “महाराज! यही है मेरी पोटली, मेरे जीवन भर की कमाई।”

राजा, “भोला! तुम्हें शर्म नहीं आती? ऊपर वाले ने तुम्हें इतना अच्छा शरीर दिया है,

तुम्हें तो मेहनत करके पैसे कमाने चाहिए ना कि लोगों से छीनकर। तुम्हें पता नहीं लूटपाट करने की इस राज्य में क्या सजा मिलती है?”

भोला, “महाराज! मैंने कोई पैसे नहीं छीने। यह थैली मुझे इसने अपनी स्वेच्छा से दी थी ताकि मैं बीन बजाना बंद कर दूं।”

मूर्ति, “नहीं महाराज! यह झूठ बोल रहा है। आप ही बताइए कि बीन की इतनी मधुर आवाज किसी को कैसे बुरी लग सकती है?

और अगर अच्छी नहीं भी लगे, तो भी कोई भला इतने पैसे क्यों देगा?”

राजा को मूर्ति की बात सही लगती है और वे भोला को फांसी की सजा सुना देते हैं।

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राजा, “भोला ने हमारे राज्य में चोरी करने की गुस्ताखी की है, इसलिए उसे आज से तीन दिन के बाद फांसी पर लटका दिया जाए।”

तीन दिन बाद नगर के चौक पर भोला को ले जाया गया। वहां मूर्ति भी खुश होकर खड़ा था। फांसी से पहले आखिरी इच्छा पूछी गई।

राजा, “भोला! तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा है तो तुम बता सकते हो।”

भोला, “हुजूर! मैं मरने से पहले जो है आखिरी बार थोड़ी देर अपनी बीन बजाना चाहता हूं।”

मूर्ति, “नहीं-नहीं महाराज! उसे बीन बजाने की आज्ञा बिल्कुल ना दी जाए वरना अनर्थ हो जाएगा।”

राजा, “तुम शांति से खड़े रहो! मरने वाले की अंतिम इच्छा पूरी करना कानून का फर्ज होता है। सिपाहियों! जाओ और भोला की बीन उसको वापस कर दो।”

सिपाही भोला को बीन देता है और भोला बीन बजाना शुरू करता है।

राजा के साथ-साथ वहां मौजूद सारे लोग नाचने लगे। जैसे-जैसे बीन तेज हुई, सब बेहाल होकर नाचने लगे।

राजा, “ईश्वर के लिए तुम यह बीन बजाना बंद कर दो! अगर तुम अभी बंद कर दोगे तो मैं तुम्हें प्राण दान दे दूंगा।”

भोला, “अब बताओ सेठ! मैंने तुम्हारी पैसों की थैली छीन कर ली थी या तुमने स्वेच्छा से मुझे थैली दी थी?”

मूर्ति, “मुझे माफ कर दो! मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं, बस ये बीन मत बजाना। मैंने वो अपनी स्वेच्छा से तुम्हें दी थी।”

राजा, “इस दुष्ट मूर्ति को अभी कैदखाने में डाल दो!”

मूर्ति, “महाराज! मुझे माफ कर दीजिए, मैं इसी लायक हूं। आप मुझे कारागार में डाल दीजिए परंतु इस बीन की आवाज से बचा लीजिए।”

भोला, “महाराज! इसने सिर्फ पैसों की थैली ही नहीं दी थी, इसने मुझे यह वादा भी किया था कि इसके पास जितने भी पक्षी हैं उन सबको यह मुक्त कर देगा।”

राजा सिपाहियों को आदेश देते हैं कि मूर्ति के सारे पक्षी आजाद कर दिए जाएं और उसे आजीवन कारावास में डाल दिया जाए।

राजा, “भोला! हम बाकी चीज तो समझ गए लेकिन तुम्हारे इस जादुई बीन का राज क्या है?”

भोला महाराज को वन देवता के वरदान के बारे में बताता है।

राजा, “हम तुम्हारी सूझबूझ से बहुत प्रसन्न हुए। अगर तुम चाहते तो वन देवता से अपने लिए धन-वैभव मांग सकते थे।

लेकिन तुमने पक्षियों के बारे में सोचा। इसलिए हम तुम्हें अपने राज्य में मंत्री का पद देते हैं।”

भोला, “महाराज! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। पशु-पक्षियों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य बनता है,

लेकिन उन्हें कैद में रखकर नहीं, उन्हें उनकी आजादी देकर। हमें भी तो अपनी आजादी पसंद है।”

उस दिन के बाद रायगढ़ में फिर से चिड़ियों की और बच्चों की चहचहाहट गूंजने लगी।


दोस्तो ये Magical Story आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!


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