हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” बुरी नज़र ” यह एक Ghost Story है। अगर आपको Hindi Horror Stories, Horrible Stories या Darawani Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।
कहते हैं बुरी नजर सिर्फ देखती नहीं टटोलती है। पहले आपकी हंसी से शुरू करती है, फिर आपकी चाल और आखिर में आपकी सांसे।
यह कहानी उसी नजर की है। एक ऐसी नजर जो किसी को बस देखती नहीं, कब्जा कर लेती है।
अंजलि 22 साल की लड़की थी। उसे कभी नहीं लगा था कि किसी की नजर उसकी दुनिया बदल देगी।
कॉलेज की शाम अंजलि सबसे अच्छी दोस्त दिव्या के साथ गेट की तरफ बढ़ रही थी।
अंजलि, “चल ना, एक दिन जल्दी घर जाएंगे। मेरा अभी भी एक एक्सपेरिमेंट पेंडिंग है।”
दिव्या, “मुझे तो ये एक्सपेरिमेंट शब्द सुनकर भी चक्कर आने लगते हैं।”
दोनों हंसते हैं। लेकिन उस हंसी की गूंज के बीच एक नजर अंजलि पर टिकी थी।
कॉलेज गेट के बाहर एक नीली जैकेट वाला आदमी खड़ा था। उम्र लगभग 30 से 32 साल। वो किसी और को नहीं, सिर्फ अंजलि को देख रहा था।
दिव्या, “अंजलि, गेट पर खड़ा आदमी तुझे ही घूरे जा रहा है।”
अंजलि, “ऐसे ही देख रहा होगा।”
दिव्या, “नहीं, कुछ तो अजीब है उसके देखने में।”
अंजलि अनदेखा कर देती है। लेकिन जाते-जाते एक पल के लिए वो भी उस आदमी की तरफ देखती है और वो आदमी बिना पलक झपके उसे घूरता रहता है।
शाम अंधेरी होती जा रही थी। सड़क सुनसान थी। दिव्या अपना रास्ता अलग कर लेती है
और अंजलि अकेली रह जाती है। चलते-चलते उसे पीछे किसी के कदमों की आवाज सुनाई देती है।
टप टप टप।
अंजलि, “कोई है?”
लेकिन कदम बढ़ते ही आवाज फिर… टप टप टप
अंजलि थोड़ी रफ्तार बढ़ाती है। कदमों की आवाज भी उतनी ही बढ़ती है। वो मुड़कर देखती है और दूर वही आदमी खड़ा था।
इस बार सड़क के एकदम बीचोंबीच। रोशनी कम थी। पर उसकी आंखें साफ दिख रही थी, बिल्कुल लाल। जैसे किसी ने उसे घंटों रोने पर मजबूर किया हो।
अंजलि (मन में), “ये क्या वही आदमी?”
वो तेजी से घर की ओर भागती है। पीछे कदमों की आवाज अभी भी आती है और फिर अचानक चुप्पी।
वो दौड़ती हुई घर में दाखिल होती है। दरवाजा बंद करती है। अंजलि सोने की कोशिश कर रही थी।
अचानक खिड़की अपने आप हिलने लगी। अंजलि खिड़की के पास जाती है। धीरे से हाथ बढ़ाती है और हिलती हुई खिड़की अचानक बंद हो जाती है।
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धड़ाम!
अंजलि वाशरूम की तरफ गई। लेकिन जब वो आईने में देखती है उसके पीछे एक साया खड़ा था।
वो मुड़ती है पर पीछे कोई भी नहीं। वापस आईने में साया अभी भी था और उस साए की आंखें उसी नीली जैकेट वाले आदमी जैसी थी।
अंजलि, “ये कौन है?”
आईने पर हल्की धुंध उठती है और उस धुंध पर एक शब्द उभरता है— “देखा है”
अंजलि की मां कमरे में आती है।
मां, “अंजलि पूरे कमरे में बिखराव मचा रखा है।”
अंजलि, “मैं सोई नहीं, मां।”
मां, “तुझे शायद बुरा सपना आया होगा।”
अंजलि को खुद भी शक था कि शायद वो महज वहम था। लेकिन उसके हाथ में जो उकेरी हुई हल्की नीली खरोंचें थी, वो वहम नहीं थी।
दिव्या, “तेरे चेहरे का रंग क्यों उड़ा हुआ है? सब ठीक तो है ना?”
अंजलि, “दिव्या उस आदमी को फिर से देखा मैंने।”
दिव्या, “अरे पागल! ये सब नजरवज़र कुछ नहीं होता।”
अंजलि, “नहीं दिव्या, यह कुछ और है।”
अचानक कॉलेज के मैदान के दूसरी तरफ वही आदमी फिर दिखता है। इस बार बिल्कुल सफेद कपड़ों में। अंजलि तुरंत दिव्या का हाथ पकड़ती है।
अंजलि, “देख, वो रहा।”
दिव्या देखती है लेकिन उसके लिए वहां कोई नहीं होता।
दिव्या, “अंजलि, वहां कोई नहीं है।”
सबसे खतरनाक क्षण वो होता है जब आपको वही दिखे जो औरों को ना दिखे। अंजलि कांप जाती है। अंजलि शाम को अपने कमरे में थी जब… टक टक टक
कमरे की अलमारी अपने आप खुलने लगती है। फिर अचानक अलमारी से सारे कपड़े नीचे गिर जाते हैं।
धड़ा धप धप
और कपड़ों के ढेर के बीच एक पुरानी जली हुई तस्वीर पड़ी थी। उसमें वही आदमी था
और तस्वीर के नीचे लिखा था— “जिसे देख लूं उसे पाऊंगा।” अंजलि की चीख गूंज उठती है। अंजलि की मां उसे स्थानीय पंडित के पास ले जाती है।
पंडित, “लड़की पर बहुत भारी नजर पड़ी है। यह कोई इंसानी नजर नहीं है।”
मां, “लेकिन वो कौन है?”
पंडित, “देखिए, उसके बारे में जानना काफी खतरनाक हो सकता है। लेकिन एक बात साफ है वो छोड़ने वाला नहीं है।”
मां, “इसका इलाज क्या है?”
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पंडित, “इलाज है लेकिन लड़की को बहुत संभल कर रहना होगा। जो नजर उस पर लगी है, वो अक्सर अपना हक लेने आती है।”
अंजलि को समझ नहीं आ रहा था कि उसकी क्या गलती थी? सिर्फ एक नजर और जिंदगी बदल गई।
अंजलि को नींद नहीं आ रही थी। हवा में एक अजीब सी बदबू थी— जूते की चमड़ा जलने जैसी।
अचानक खिड़की जोर से खुल गई। पर्दों के बीच से काला साया भीतर आया। धीमे-धीमे। अंजलि बिस्तर पर जमी रह गई।
उसका शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया। साया उसके बिल्कुल करीब आया और उसके कान के पास एक फुसफुसाहट हुई।
आवाज़, “तूने मुझे देखा था।”
अंजलि चीख मारती है। कमरे की लाइट अपने आप जल जाती है और साया गायब हो जाता है।
अंजलि क्लास में बैठी हुई थी कि उसकी नोटबुक अपने आप खुलने लगी। पन्ने पलटते गए और बीच में एक वाक्य उभर आया— “तू मेरी है।” अंजलि घबरा जाती है।
दिव्या, “अंजलि, मैं हूं ना… तू डर मत।”
अंजलि, “दिव्या, वो हर जगह है। हर जगह… मैं क्या करूं?”
अचानक क्लास की सारी लाइटें बंद हो जाती है। क्लास में अंधेरा हो जाता है और पीछे से एक गहरी आवाज आती है— “अंजलि।”
दिव्या सुन नहीं पाती लेकिन अंजलि सुनती है। लाइट जलती है। सब सामान्य होता है लेकिन अंजलि की सीट पर एक काले धुएं का धब्बा था।
वो आदमी अंजलि की हर सांस में उतर रहा था। अंजलि और उसकी मां पंडित के घर पहुंचते हैं।
पंडित, “लड़की, मुझे बताओ क्या उस आदमी ने कभी तुझसे से कुछ कहा है?”
अंजलि, “जी, रात को एक बार उसने मेरे कान के पास कहा था— तूने मुझे देखा था।”
पंडित एकदम खड़े हो जाते हैं।
पंडित, “यही डर था मुझे। ये नजर सामान्य नहीं है। वो आदमी जीवित ही नहीं है।”
मां, “तो फिर वो दिखता कैसे है?”
पंडित, “कोई आत्मा नहीं। वो एक अधूरी नजर है। एक ऐसी नजर जिस व्यक्ति पर टिक जाए वो उसको पाने की कोशिश में उसके शरीर और दिमाग में उतरने लगती है।”
अंजलि, “पर मुझे क्यों?”
पंडित, “क्योंकि तूने उसके शेष क्षण देख लिए हैं।”
अंजलि, “शेष क्षण?”
पंडित, “जब कोई आदमी अपने आखिरी क्षण में किसी एक चीज को नजर में कैद कर ले तो वो नजर हमेशा उसी चीज से चिपकी रहती है
और तू वही चीज बन गई है उसकी आखिरी याद। और सबसे बड़ी बात जिस आदमी को तू देख रही है
वो पिछले महीने एक दुर्घटना में मरा था। उसी जगह जहां से तू रोज कॉलेज आती है।”
अंजलि की सांस रुक जाती है। मां उसे पकड़ लेती है। अंजलि और दिव्या अगले दिन उसी सड़क पर जाती है जहां वो आदमी हमेशा दिखता था।
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अंजलि, “यही… यही वो जगह है। दिव्या, मुझे लगता है उसकी मौत यहीं हुई थी।”
दोनों सड़क किनारे खोजने लगती हैं। दिव्या को एक पुराने बिजली के खंभे पर एक छोटा पोस्टर मिलता है— एक आदमी की तस्वीर।
पोस्टर पर लिखा था: गुमशुदा। अमन वर्मा, उम्र 32, अंतिम बार 14 सितंबर की रात देखा गया।
दिव्या, “इसका मतलब वो मरा नहीं।”
पर अंजलि कुछ और ही देख रही थी। पोस्टर के बिल्कुल नीचे जमीन पर एक काला निशान था।
आवाज़, “देखा था तूने… आखिरी बार।”
अंजलि झटके से पीछे हटती है।
दिव्या, “क्या हुआ, अंजलि?”
अंजलि, “मुझे लग रहा है कि उसने मरते समय मुझे देखा था।”
अंजलि अपने दिमाग को पीछे ले जाने की कोशिश करती है। 14 सितंबर, उसी दिन वो कॉलेज से लौट रही थी।
उसे याद आता है सड़क के बीचोंबीच एक आदमी खड़ा था। लड़खड़ाता हुआ वो अंजलि की तरफ देखकर कुछ कहना चाह रहा था
और तभी एक कार तेजी से आई और उसे टक्कर मार दी। अंजलि उस समय डर कर भाग गई थी। पीछे पलट कर देखना भी नहीं चाहा।
अंजलि, “दिव्या, उस दिन मैंने देखा था उसे। वो मुझसे मदद मांग रहा था और मैंने… मैंने भागकर उसे अकेला छोड़ दिया।”
दिव्या, “इसमें तेरी गलती नहीं थी अंजलि। कौन नहीं डरता?”
लेकिन अंजलि टूट चुकी थी। अंजलि नींद से उठती है। अचानक बिस्तर के नीचे से आवाज आती है— “अंजलि।”
वो धीरे-धीरे नीचे झुक कर देखती है और वहां बिस्तर के नीचे वही आदमी लेटा हुआ था।
अमन, “तूने मुझे मरते देखा था।”
अंजलि चीखती है। अमन बिस्तर के नीचे से बाहर निकलता है। वो खड़ा होता है और उसकी आंखें अंजलि की ओर घूमती है।
अमन, “और अब तू भी मेरे साथ चलेगी।”
वो हाथ बढ़ाता है और हवा में गायब हो जाता है।
अगले दिन…
दिव्या, “अंजली, अब यह सब नहीं होगा।”
वो पंडित को बुलाती है। पंडित अंजलि के कमरे में प्रवेश करते ही कांप जाते हैं।
पंडित, “यहां तो उसका कब्जा है।”
अंजलि, “क्या मैं बच जाऊंगी?”
पंडित, “एक ही तरीका है। तुझे वही जगह पर जाना होगा जहां उसने आखिरी बार तुझे देखा था।”
पंडित कुछ मंत्र, मिट्टी और एक ताबीज देता है और चेतावनी भी देता है।
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पंडित, “ध्यान रखना उसकी नजर जब पूरी तरह बदल जाए तो वो अपने शिकार से सिर्फ एक चीज चाहता है।”
अंजलि, “क्या चीज?”
पंडित, “उसके मरने के समय जो खोया था वही।”
अंजलि समझ नहीं पाती। दिव्या और अंजलि सड़क पर पहुंचती है। अचानक सड़क पर स्ट्रीट लाइट एक-एक करके बंद होने लगती है।
टप टप टप
अंधेरा फैलने लगता है। और फिर सड़क के बीचोंबीच वही आदमी खड़ा हो जाता है, अमन। नीली जैकेट, काली आंखें और चेहरे पर अधूरी चुप्पी।
अमन, “तू आ गई है। अच्छा है।”
अंजलि, “अगर तूने एक कदम भी बढ़ाया ना…”
अमन अचानक चीखता है। दिव्या पीछे गिर जाती है। सड़क पर काला धुआं फैल जाता है। अमन धीरे-धीरे चलता है अंजलि की तरफ।
अमन, “मेरी मौत के वक्त मैं किसी को आसरा देना चाहता था।”
अंजलि चौंकती है, “क्या?”
अमन आंखें बंद कर लेता है।
अमन, “उस रात तू रो रही थी। मुझे लगा तू घायल है। मैं… मैं तुझे बचाने आया था पर कार ने…”
अंजलि स्तब्ध हो गई।
अमन, “मरते समय मेरी आखिरी नजर तुझ पर थी तुझे बचाने की। पर तू भाग गई और मैं… मैं अधूरा रह गया।”
अंजलि के आंसू बहने लगते हैं।
अंजलि, “मैं उस दिन बहुत डर गई थी। पर आज… आज शुक्रिया कह रही हूं।”
अमन का चेहरा नरम पड़ता है। जैसे वह सुकून पा रहा हो। वो धीरे-धीरे मुस्कुराता है और कहता है— “बस यही… यही चाहिए था मुझे।”
उसका शरीर धुएं में तब्दील होने लगता है। सड़क पर हल्की नीली रोशनी उठती है और अमन गायब हो जाता है।
टेबल पर एक पुरानी जली हुई फोटो रखी थी अमन की। उसके नीचे सिर्फ एक शब्द लिखा था— “मुक्त”।
अंजलि मुस्कुराती है। धीमी, शांत और सुकून भरी।
दोस्तो ये Horror Story आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!

