चतुर दामाद | Chatur DAMAAD | Hindi Kahani | Achhi Achhi Kahani | Hindi Stories

व्हाट्सएप ग्रुप ज्वॉइन करें!

Join Now

टेलीग्राम ग्रुप ज्वॉइन करें!

Join Now

हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” चतुर दामाद ” यह एक Hindi Story है। अगर आपको Hindi Stories, Hindi Kahani या Achhi Achhi Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।


सीतापुर गाँव में सुमन नाम की एक विधवा अपनी बेटी मीना और बेटा बिलुआ के साथ रहा करती थी।

दो वर्ष पहले मीना के पिताजी की हार्ट टैक से मौत हो गयी थी। मीना जवान हो चुकी थी।

सुमन उसके लिए योग्य वर ढूंढ रही थी। एक दिन जाडे की धूप में सुमन मीना के साथ अपने घर के पास बैठी थी।

तभी डाकिया बाबू धरमू काका साइकिल की घंटी की आवाज बजाते हैं।

सुमन, “अरे डाकिया बाबू! कभी हम गरीब के घर भी ठहर कर चाय पी लिया करो। तेजी से भागे जा रहे हो।

तुम तो जानते ही हो, जो मेरा है, बस इसी गाँव में है। कहीं कोई नहीं, जो चिट्ठी भेजा करे।”

डाकिया धरमू काका, “अरे! ऐसी बात नहीं है दादी। ठंड के दिन में दिन जल्दी ढल जाते हैं।

सोचता हूँ की शाम से पहले काम कर, आराम से घर जाकर कंबल ओड के सो जाऊँ।”

सुमन, “ओ डाकिया बाबू! खटिया पर बैठो। मीना, काका के लिए चाय तो लाओ, ठण्ड काफी है।”

मीना के जाने के बाद।

डाकिया धरमू काका, “मीना काफी बडी हो गई है। अब तो यह भी शादी लायक हो गई है।”

सुमन, “हाँ डाक बाबू। मीना के पिताजी की इच्छा थी की पढा लिखा कोई सुयोग्य वर देखकर इसकी शादी कर दी जाए। लेकिन उनकी इच्छा तो अधूरी ही रह गयी।”

डाकिया धरमू काका, “सब ऊपर वाले की लीला है दादी, उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं होता।”

सुमन, “डाकिया बाबू, तुम तो जगह जगह घूमते हो, इसके लिए कोई अच्छा सा रिश्ता बताओ।

तुम्हें तो पता ही है, इसका भाई बिलुआ बेईमान है। इससे पहले कि वो खेत घर बेच दे, मैं इसकी शादी कर देना चाहती हूँ।”

डाकिया धरमू काका, “कासगंज गाँव के विजय का बेटा प्रकाश बहुत ही अच्छा और होनहार है, दादी।

गाँव में ही टीचर है। वो मीना के लिए अच्छा रहेगा। आप कहो तो मैं बात चलाऊँ?”

सुमन, “नेकी और पूछ पूछ। भाई, जितनी जल्दी हो, उससे बात चलाओ। फागुन में इसकी शादी कर देंगे।”

डाकिया धरमू काका, “ठीक है दादी, अब मैं चलता हूँ। जल्दी ही अच्छे समाचार के साथ मिलूंगा।”

मीना, “अरे! रुको काका, चाय तो पीते जाओ। ये लो, गरम-गरम अदरक वाली चाय।”

डाकिया धरमू काका, “अरे वाह! बिटिया के हाथ में तो जादू है। अच्छा है तुमने इसमें अदरक डाल दिया। मेरे गले में कुछ दिन से बहुत खराश हो रही थी, सब दूर हो जाएगा।”

धरमू काका कासगंज जाकर प्रकाश के पिताजी से बात करते हैं। सब कुछ बात पक्की हो जाती है और फागुन में शादी तय हो जाती है।

अभी नवम्बर माह में बहुत ठंड पड रही थी। इधर बिलुआ अपने दोस्तों के साथ अलाव ताप रहा था।

उधर प्रकाश चोरी छिपे मीना को देखने के लिए उसके घर के पास पहुँचता है।

चतुर दामाद | Chatur DAMAAD | Hindi Kahani | Achhi Achhi Kahani | Hindi Stories

बिलुआ, “क्या भाई साहब, इस गाँव के नये लगते हो। किसी को खोज रहे हो क्या? मकान को बहुत देर से ताड रहे हो।”

प्रकाश, “नहीं भैया, बगल के गाँव जा रहा हूँ, तो यह मकान का डिजाइन देख रहा था। मुझे भी घर बनवाना है, ऐसे ही मैं भी बनवाऊंगा। इसलिए देख रहा था।”

बिलुआ, “अच्छा तुम मकान देख रहे हो छुपके छुपके। यार, तुम तो बडे काम के आदमी हो। आओ…आलव ताप लो “

प्रकाश, “नहीं भैया, ज्यादा देर हो जाएगी पहुँचने में। मैं चलता हूँ।”

बिलुआ, “अरे आओ यार, कुछ देर ठहरा करो। गर्म हो लो, फिर चले जाना। चलो, अब एक हजार रुपए निकालो।”

प्रकाश, “क्या रुपए? किसलिए?”

बिलुआ, “वो मकान का डिजाइन देखने के लिए। मैंने यह मकान का डिजाइन हजार रुपए देकर बनवाया था।

वैसे तो लेता दो हजार हूँ, लेकिन तुम बोले की बगल के गाँव से हो, इसलिए हजार रुपए डिस्काउंट। अब लाओ हजार रुपए।”

प्रकाश समझ गया की वो मीना का भाई है, उसने तुरंत रुपए दे दिए।

बिलुआ, “शाबाश! आदमी तो आप ठीक लगते हो। वैसे पेंट करवाएंगे, तब मकान देखना। फागुन में मेरी बहन की शादी है, अगले महीने मैं इसका पेंट करवाऊँगा।

साला बहुत दिन बाद हजार रुपया मिला हाथ में। आज सुबह वैसे भी आठ हजार रुपए हार चुका था।”

मीना, “भैया चलो अन्दर, माँ खाना खाने के लिए इंतज़ार कर रही है।”

प्रकाश मीना को देखता है और देखता ही रह जाता है। तभी अचानक बिलुआ की आवाज से उसका ध्यान भटकता है।

बिलुआ, “ठीक है भाई साहब चलता हूँ, ऐसे ही आते रहना और भी मकान का डिजाइन दिखा दूंगा।

बस पैसे ढीले करते रहना। यही है जिसकी शादी फागुन में होने वाली है।”

प्रकाश का ध्यान मीना की ओर से हटता है और वो मुस्कुरा कर अपने गाँव चल देता है।

प्रकाश सोचता है की चलो एक हजार रुपए देकर मैंने अपनी होने वाली पत्नी को तो देख लिया। फागुन में प्रकाश बारात लेकर मीना के घर पहुँचता है।

बिलुआ, “पता नहीं जीजू, पर तुमको तो कहीं देखा है? देखा तो है… पता नहीं कहाँ देखा है?”

प्रकाश, “अगर आप एक हज़ार रुपए देंगे तो मैं तुरंत बताता हूँ। वरना सोचते रहिये पेट में दर्द हो जाएगा। क्या सोच रहे हो साले साहब, यह ऑफर अभी तक ही है।”

बिलुआ, “मान गए जीजू, तुम भी बडे कमीने हो। ये लो हजार और जल्दी बताओ।”

प्रकाश, “हम दो महीने पहले यहीं पर मिले थे, जब तुमने मुझसे अपने घर के डिजाइन को देखने का एक हजार रुपया ले लिया था।”

बिलुआ, “ओह हो! तो ये बात है। जीजू, तुम मकान देखने नहीं, मीना को देखने आये थे। अगर यह बात पहले पता होती तो तुमसे पांच हजार ले लेता।

चलो, मां ने तुम्हे गिफ्ट में दो लाख रुपए दिए हैं न, उसमे से साले का दस पर्सेंट कमीशन, बीस हजार रुपए जल्दी से देकर आगे का काम स्टार्ट करो।”

सुमन, “बिलुआ! तुम्हें शर्म नहीं आती मेहमान से पैसा मांगते हुए?”

बिलुआ, “शर्म कैसी? जीजू अब हमारे फैमिली मेम्बर बन गए है। अब हमारी इज्जत इनकी इज्जत बन चुकी है।

चतुर दामाद | Chatur DAMAAD | Hindi Kahani | Achhi Achhi Kahani | Hindi Stories

मुझसे मेरे दोस्त दारू पार्टी मांग रहे हैं। मेरी इज्जत दाँव पर लगी है, उसके लिए जीजू इतना भी नहीं कर सकते क्या?”

प्रकाश बीस हजार रुपए देकर बिलुआ से किसी तरह पीछा छुडाता है। संयोग से कुछ दिन बाद प्रकाश का ट्रांसफर हो जाता है। रविवार के दिन डाकिया धरमू काका प्रकाश के घर पहुँचते हैं।

डाकिया धरमू काका, “मीना बेटी… अरे ओ मीना बेटी!”

प्रकाश, “अरे! आइये-आइये डाकिया चाचा, कैसे है? बहुत दिन बाद इधर आये। रविवार छुट्टी के दिन भी काम कर रहे? इतनी भीषण गर्मी में क्यों बाहर निकलते हो चाचा?”

डाकिया धरमू काका, “अरे बेटा, काम तो काम है, उसको करना ही पडेगा। कल थोडी तबियत अच्छी नहीं लग रही थी, इसलिए कल वाली चिट्ठी आज बांट रहा हूँ।”

प्रकाश, “कर्तव्य निभाना तो कोई आपसे सीखे चाचा। पर एक शिकायत है चाचा आपसे… पहले आप आते थे तो दूर से ही ‘प्रकाश-प्रकाश’ चिल्लाते थे, और अब शादी के बाद ‘मीना-मीना’ पुकारते हैं।”

डाकिया धरमू काका, “हा हा हा…बेटा, घर असल में गृहणी का ही होता है। और मीना बेटी को तो मैं बचपन से ही देख रहा हूँ।”

प्रकाश, “ओह, मुझे तो मालूम ही नहीं था की मेरा घर अब मीना का घर बन चुका है। लो मीना भी आ गई।”

मीना, “प्रणाम धरमू काका, कैसे हैं? मेरे घर का हाल चाल बता दीजिये, बहुत दिन से वहाँ का समाचार नहीं मिला।”

डाकिया धरमू काका, “घर का हाल तो बहुत बुरा है, बेटी। अब मैं क्या कहूँ? बिलुआ की आदत तो तुम से छिपी नहीं है।

रोज दारू पी कर जुए में हार कर आता है और सुमन दादी से झगडा करते रहता है।”

मीना, “काका, यही सब देख कर तो मैंने कई बार उनसे कहा तुम यहाँ आ जाओ। लेकिन उसका पुत्र मोह और बेटी के घर नहीं रहने का सिद्धांत… उन्होंने मेरी बात नहीं मानी।”

डाकिया धरमू काका, “रो मत बेटी, अब तुम्हें मैं एक अच्छी खबर सुनाता हूँ। प्रकाश का ट्रांसफर तुम्हारे ही गाँव के मध्य विद्यालय में हो गया है। अब तुम वहाँ रहकर कम से कम माँ की देख रेख कर सकती हो।”

मीना, “सच काका? भगवान तेरा लाख लाख शुक्रिया!”

प्रकाश, “चलिए, यह भी अच्छा ही हुआ। मेरे घर में यहाँ पर भैया और भाभी तो है ही माँ पापा की सेवा करने के लिए, इसकी माँ की ही चिंता मुझे हमेशा लगी रहती थी।”

एक सप्ताह बाद प्रकाश सीतापुर गाँव के मध्य विद्यालय का प्रभारी पद संभाल लेता है और वहीं पर एक क्वार्टर लेकर रहने लगता है।

मीना बराबर अपने मायके आती जाती रहती है। एक दिन छुट्टी के दिन प्रकाश और मीना सुमन के घर पर खाने को आये हुए थे, तभी बाहर से सरपंच की आवाज आती है।

सरपंच चतुर सिंह, “सुमन भाभी! अरे ओ सुमन भाभी, जरा बाहर तो आना।”

सुमन, “क्या बात है सरपंच जी? आज हम गरीबों की कुटिया का रास्ता कैसे भूल गए?”

सरपंच चतुर सिंह, “अरे! भूलना याद आना, नया पुराना, यह सब तो होता रहता है। अब देखो, कल तक तुम्हारे दोनो बच्चे छोटे थे, लेकिन आज दोनों बडे हो गए हैं।”

सुमन, “हाँ भैया, वो तो है। मीना भी आई हुई है।”

सरपंच चतुर सिंह, “हाँ मालूम हुआ की मेहमान का ट्रांसफर हमारे गाँव के मध्य विद्यालय में हुआ।

चलो अब आपके लिए तो अच्छा ही हुआ, नहीं तो यह घर छोडकर कहाँ जाती? कम से कम गाँव में आपको मीना के क्वार्टर में एक ठिकाना तो मिला।”

सुमन, “ठिकाना…मतलब? मैं कुछ समझी नहीं।”

सरपंच चतुर सिंह, “देखो, बिलुआ इस मकान पर जुआ खेलने के लिए कर्ज पे कर्ज लेता गया। अब इस मकान की कीमत से ज्यादा कर्ज वो उठा चुका है।

चतुर दामाद | Chatur DAMAAD | Hindi Kahani | Achhi Achhi Kahani | Hindi Stories

मैं ज्यादा दिन तक बर्दाश्त नहीं कर सकता। अब तुम्हें मकान खाली करना पडेगा।”

प्रकाश, “ऐसे कैसे खाली करना पडेगा, सरपंच जी? आप तो जानते ही हैं की बोलने से नहीं, कागज से सब चीजें होती हैं।

पहली बात तो ये है की यह मकान माँ के नाम पर है यानि सुमन देवी के नाम पर है। जब तक ये सिग्नेचर नहीं कर देती, आप कैसे इस पर दावा कर सकते हैं?

दूसरी बात तो यह है कि बिलुआ ने जितने भी पैसे लिए हैं, क्या आपने कागज पर या स्टैंप पेपर पर लिखवाए हैं? अगर वो है तो आप कोर्ट में पेश कीजिये।”

सरपंच चतुर सिंह, “देखिये मास्टर साहब, आप यहाँ के मेहमान हैं। आप इस गाँव के मामले में दखल मत दीजिये। ये आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं होगा।”

प्रकाश स्कूल से लौट रहा था, तभी चतुर सिंह के गुंडों ने उसे धमकाया।

गुंडे, “तुम्हें कागज दिखाने का बडा शौक है? यह सीतापुर है। यहाँ अगर ठीक से रहना है तो यहाँ की राजनीति से दूर रहो।”

गुंडों के जाने के बाद प्रकाश पुलिस स्टेशन पहुँचता है।

प्रकाश, “इंस्पेक्टर साहब, मुझे रिपोर्ट लिखवानी है। चतुर सिंह के गुंडों ने मुझे धमकाया है।”

इंस्पेक्टर टोंडे, “देखो मास्टर साहब, आप इस गाँव में नए हो। जहाँ तक मुझे जानकारी है, सरपंच चतुर सिंह गाँव के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। आपको जरूर कोई गलतफहमी हुई है। घर जाइए और आराम कीजिए।”

प्रकाश जब थाने से निकलता है तो इंस्पेक्टर तुरंत चतुर सिंह को फ़ोन लगा देता है।

इंस्पेक्टर टोंडे, “हेलो सरपंच जी! मास्टर आपके खिलाफ कंप्लेंट करने आया था, मैंने समझा बुझा कर भेज दिया है। पर पढा लिखा है, देख लेना कहीं बात आगे तक न ले जाए।”

सरपंच चतुर सिंह, “जानकारी देने के लिए शुक्रिया इंस्पेक्टर साहब। लगता है मैटर को मास्टर स्ट्रोक देना ही पडेगा।”

चतुर सिंह गुंडों को बुला लेता है। गुंडे रास्ते में प्रकाश को घेर लेते हैं।

गुंडे, “ये ले! अब कागज दिखाते रहना की कितने डंडे आगे पडे हैं और कितने पीछे पडे हैं?”

मास्टर वहीं बेहोश हो जाता है। किसी ने मीना को बताया कि मास्टर साहब रास्ते में घायल होकर गिर पडे है।

मीना और स्कूल स्टाफ प्रकाश को शहर के हॉस्पिटल में भर्ती करवाते हैं। इधर सरपंच चतुर सिंह बिलुआ के घर का सारा सामान घर से बाहर फेंक देता है।

सुमन, “सरपंच साहब ऐसा मत कीजिये, हम कहाँ जायेंगे?”

सरपंच चतुर सिंह, “जाओ उस मास्टर के क्वार्टर में। बहुत कागज दिखाने की मांग कर रहा था, अब हॉस्पिटल में अपना जख्म दिखा रहा है।”

बिलुआ, “देखो सरपंच जी, यह अच्छी बात नहीं है।”

सरपंच चतुर सिंह, “तू चुप कर शराबी! मुझे धमकी देता है? एक पैसा अभी तक लौटाया नहीं। मारो साले को!”

गुंडे बिलुआ को चार लाठी मार कर वहीं घायल कर देते हैं।

सुमन जैसे तैसे अपने बेटे को लेकर और सामान को एक ठेले पर लाद प्रकाश के क्वार्टर में शिफ्ट कर जाती है।

इधर अस्पताल में प्रकाश के बेड के ठीक बगल में वीआईपी वाले वार्ड में कई नेता घायल होकर पहुँचते हैं।

उससे कुछ स्टेटमेंट लेने के लिए शहर के एसीपी धाकड सिंह आए हुए होते हैं। धाकड सिंह नेता का स्टेटमेंट लेकर निकल ही रहे होते हैं की तभी उनकी नज़र प्रकाश पर पडती है।

एसीपी धाकड सिंह, “अरे प्रकाश! तू यहाँ कैसे?”

प्रकाश, “अरे! कैसे हो मेरे दोस्त? बहुत दिन बाद मिले।”

चतुर दामाद | Chatur DAMAAD | Hindi Kahani | Achhi Achhi Kahani | Hindi Stories

एसीपी धाकड सिंह, “मस्त हूँ यार, सिविल सर्विस निकलने के बाद एसीपी बन गया हूँ। इसी जिले में एसीपी हूँ। तू बता मास्टरी कैसी चल रही है?”

प्रकाश, “अरे यार! गाँव के एक बेईमान सरपंच ने गुंडे भेज कर मेरा यह हाल कर दिया है।”

एसीपी धाकड सिंह, “तो तू ने थाने में कंप्लेंट क्यों नहीं किया?”

प्रकाश, “गया था मेरे दोस्त, पर तू तो जानता ही है अपने डिपार्टमेंट को। इंस्पेक्टर टोंडे ने केस दर्ज करने से मना कर दिया।”

एसीपी धाकड सिंह (फ़ोन पर), “एक मिनट… मैं एसीपी बोल रहा हूँ। थोडा सीतापुर थाने के इंस्पेक्टर को लाइन पर लाना। बोलो एसीपी साहब बात करेंगे।”

इंस्पेक्टर टोंडे (फ़ोन पर), “जय हिंद सर!”

एसीपी धाकड सिंह, “इंस्पेक्टर साहब, आपके इलाके में मेरा एक दोस्त मास्टर प्रकाश है, सुना है उसका एफआईआर दर्ज करने से आपने मना कर दिया था?”

इंस्पेक्टर टोंडे, “नहीं सर, गलतफहमी हो गयी थी सर… सॉरी सर।”

एसीपी धाकड सिंह, “कल दस बजे तक उस सरपंच की सारी क्राइम कुंडली मेरे टेबल पर चाहिए। अगर नहीं हुई तो लाइन हाजिर होने के लिए तैयार रहना।”

इंस्पेक्टर टोंडे, “जी सर!”

एसीपी धाकड सिंह, “क्या जी सर? लाइन हाजिर होने के लिए?”

इंस्पेक्टर टोंडे, “नहीं सर। जी-जी सर काम हो जायेगा।”

प्रकाश, “बहुत बहुत शुक्रिया मेरे दोस्त।”

एसीपी धाकड सिंह, “अरे! इन गुंडों की तो तेरा भाई अच्छे से खबर लेगा, तू फिकर न कर।”

दूसरे दिन चतुर सिंह के खिलाफ एफआईआर दायर कर, इंस्पेक्टर टोंडे उसे गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश करता है।

सुमन के घर को कब्जे से मुक्त कर, सुमन को वहाँ शिफ्ट करवाता है। उधर कोर्ट सरपंच को 6 महीने जेल की सजा सुनाता है। प्रकाश ठीक होकर घर आ जाता है।

बिलुआ, “जीजू मुझे माफ कर दो प्लीज। आज के बाद दारू जूए को हाथ तक नहीं लगाऊँगा।”

सुमन, “बेटा, जो काम हमने पच्चीस वर्षों में नहीं किया, वो तुमने 6 महीनों में कर दिखाया। भगवान ऐसा दामाद और बेटा सभी को दें।”


दोस्तो ये Hindi Story आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!


Leave a Comment

लालची पावभाजी वाला – Hindi Kahanii ईमानदार हलवाई – दिलचस्प हिंदी कहानी। रहस्यमय चित्रकार की दिलचस्प हिंदी कहानी ससुराल में बासी खाना बनाने वाली बहू भैंस चोर – Hindi Kahani