हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” डरपोक पति ” यह एक Funny Story है। अगर आपको Short Funny Stories, Comedy Funny Stories या Majedar Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।
माधवपुर में रहने वाला सेठ बंसी बहुत बड़ा कंजूस व्यक्ति है। उसकी कंजूसी सिर्फ माधोपुर में ही नहीं, आसपास के गांव में भी प्रसिद्ध है।
एक बार सेठ बंसी अपनी पत्नी रज्जो के साथ उसके मायके जा रहा था।
रज्जो, “सेठ जी, मैं तैयार हूं। सवारी कितनी देर में आएगी?”
सेठ, “अरे भाग्यवान! कौन सी सवारी?”
रज्जो, “आज हम दोनों मेरे मायके जा रहे हैं, वहां जाने के लिए हमें सवारी तो चाहिए होगी ना?”
बंसी, “भाग्यवान! तू कुछ भी नहीं समझती। हम जो पैसे गाड़ी वाले को देंगे, उस पैसे से मैं तेरे लिए नई साड़ी खरीद दूंगा, समझी?”
रज्जो, “लेकिन सेठ जी! मेरा मायका तो कितनी दूर है। पूरा एक जंगल बीच में पड़ता है जिसे पार करके जाना होगा।”
बंसी, “कोई बात नहीं! हम इतने दिनों के बाद तुम्हारे मायके जा रहे हैं, आराम से जाएंगे। रास्ते में रुक-रुक कर चलेंगे। अरे भाई, जल्दी क्या है?”
रज्जो, “अगर रास्ते में रुक-रुक कर जाएंगे तो मायके तो रात को ही पहुंचेंगे। फिर वापस कब आएंगे?”
बंसी, “अरे भाग्यवान! तू कैसी बातें करती है? तू इतने समय बाद मायके जा रही है, कम से कम दो दिन तो वहां रुकेगी। तेरे मां और बापू भी खुश हो जाएंगे।”
रज्जो, “हां! आप बात तो ठीक कह रहे हैं। चलिए ठीक है, हम पैदल ही चलते हैं।”
सेठ बंसी सवारी गाड़ी के पैसे बचाने के चक्कर में अपनी पत्नी रज्जो को पैदल ही उसके मायके लेकर निकल पड़ता है।
भोली-भाली रज्जो इस बात को समझ नहीं पाती और खुशी-खुशी सेठ बंसी के साथ पैदल ही चल देती है।
रास्ते में खजूर का बगीचा पड़ता है।
बंसी, “भाग्यवान! देखो खजूर के कितने बड़े-बड़े पेड़ लगे हैं? और इन पर खजूर भी लगे हुए हैं।”
रज्जो, “हां सेठ जी! ये तो पके हुए खजूर हैं। देखकर ही लग रहा है कितने मीठे और स्वादिष्ट होंगे?”
बंसी, “तुम सही कह रही हो भाग्यवान! खजूर देखने में तो बड़े ही स्वादिष्ट लग रहे हैं।”
सेठ बंसी को खजूर बहुत पसंद हैं, लेकिन अपनी कंजूसी के कारण वो कभी भी बाजार से खरीदकर खजूर नहीं खाता। आज खजूर को देखकर उससे रहा नहीं जा रहा।
बंसी, “भाग्यवान! मैं एक काम करता हूं, पेड़ पर चढ़ जाता हूं और थोड़े खजूर तोड़ कर लाता हूं।”
रज्जो, “नहीं-नहीं सेठ जी! आप कैसी बातें कर रहे हैं? ये खजूर का पेड़ है, कोई आम का नहीं। आप इतने ऊंचे पेड़ पर चढ़ेंगे कैसे?”
बंसी, “अरे! तू फिक्र मत कर, चढ़ तो मैं जाऊंगा ही।”
रज्जो, “लेकिन अगर कोई आ गया तो आपकी बेइज्जती नहीं होगी? इस उम्र में आप पेड़ पर चढ़कर खजूर की चोरी कर रहे हैं। एक काम कीजिए, आप बाजार से खरीद कर खा लीजिए खजूर।”
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बंसी, “अरे भाग्यवान! जो स्वाद चुराए हुए खजूरों में होगा ना, वह बाजार से खरीदे हुए खजूरों में थोड़े ही मिलेगा।”
रज्जो के लाख मना करने पर भी सेठ बंसी ने उसकी बात नहीं मानी और खजूर के लालच में पेड़ पर चढ़ गया।
ऊपर पहुंचकर उसने सबसे पहले जल्दी-जल्दी दो-चार खजूर तोड़कर खा लिए।
बंसी, “भाग्यवान! ये खजूर तो वाकई बड़े मीठे हैं। आहा हा! मजा आ गया! आहा!”
रज्जो, “आप अकेले ही खाएंगे क्या? मुझे भी तो दीजिए ना कुछ।”
बंसी, “हां-हां भाग्यवान! तुम्हें भी देता हूं। रुक जाओ, मैं खजूर तोड़कर नीचे गिराता हूं। तुम थैली में रख भी लो।”
रज्जो, “ठीक है! आप खजूर तोड़कर नीचे गिरा दीजिए। देखिए, मैं दो-चार खजूर खाकर बाकी के थैले में भर लूंगी।”
सेठ बंसी खजूर तोड़कर अपनी पत्नी को देने के लिए जैसे ही नीचे देखता है, उसकी हालत डर के मारे खराब हो जाती है।
रज्जो, “अरे! क्या हुआ सेठ जी? गिराए ना खजूर!”
बंसी, “अ… राम-राम, राम-राम, राम-राम, राम-राम!”
रज्जो, “सेठ जी! राम नाम की माला क्यों जप रहे हैं? खजूर फेंकिए।”
बंसी, “राम नाम की माला नहीं जप रहा, राम के पास जाने का समय आ गया है।”
रज्जो, “आप ये कैसी बातें कर रहे हैं?”
बंसी, “मुझे यहां नीचे मेरी मृत्यु दिखाई दे रही है और कुछ भी नहीं।”
रज्जो, “क्या बातें कर रहे हैं आप?”
बंसी, “अरे भाग्यवान! अब मेरे ऊपर जाने का समय आ गया है। तू मेरे बचाए हुए और मेहनत से कमाए हुए धन का ध्यान रखना। उसे… उसे खर्च मत करना।”
सेठ बंसी बहुत डर गया, उसे खुली आंखों से यमराज दिखने लगे।
रज्जो, “आप कैसी बातें कर रहे हैं? डरिए मत, हिम्मत रखिए और धीरे-धीरे पेड़ से उतरने की कोशिश कीजिए।”
बंसी, “नहीं-नहीं! मैं… मैं यहीं ठीक हूं, मैं यहीं ठीक हूं।”
रज्जो, “आखिर आप पेड़ के ऊपर कब तक बैठे रहेंगे? नीचे तो आपको उतरना ही होगा ना? थोड़ी हिम्मत कीजिए और भगवान का नाम लेते हुए नीचे उतर आइए।”
बंसी, “शायद तुम सही कह रही हो भाग्यवान। हे भगवान! अगर तूने मुझे सही सलामत इस पेड़ से नीचे उतार दिया ना, तो मैं… तो मैं पूरे 1000 ब्राह्मणों को भोजन कराऊंगा। हां-हां पक्का।”
रज्जो, “सेठ जी! नीचे मत देखिए। पेड़ के ऊपर देखते-देखते धीरे-धीरे नीचे सरकने की कोशिश करो।”
थोड़ी देर भगवान का नाम लेते-लेते और रज्जो की बातों में सेठ बंसी ने थोड़ी हिम्मत जुटाई और वह पेड़ से थोड़ा नीचे उतरा। उसने अपनी आंखें खोलकर नीचे देखा।
बंसी, “अरे भाग्यवान! देखो-देखो मैं थोड़ा नीचे आ गया पेड़ से।”
रज्जो, “हां सेठ जी! आप ऐसे ही हिम्मत करिए। फिर भगवान का नाम लीजिए और धीरे-धीरे नीचे सरकते जाइए।”
बंसी, “भाग्यवान! मैं फिर से कोशिश करता हूं।”
सेठ बंसी फिर से भगवान का नाम लेता है और थोड़ा और नीचे जाता है।
बंसी, “अरे भाग्यवान! यह इतना भी कठिन नहीं है जितना मैं सोच रहा था। मुझे लगता है कि अगर मैं 500 ब्राह्मणों को भोजन कराऊंगा, तब भी भगवान मुझे सही सलामत नीचे पहुंचा देंगे।”
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रज्जो, “सेठ जी! कैसी बातें कर रहे हैं आप?”
बंसी, “अरे! बिल्कुल सही कह रहा हूं! यह इतना मुश्किल काम नहीं है। 1000 ब्राह्मण तो बहुत ज्यादा हो जाएंगे, 500 ठीक है।
हे भगवान! तू मुझे इस पेड़ से सही सलामत नीचे उतार दे, मैं… मैं 500 ब्राह्मणों को भोजन कराऊंगा। पक्का-पक्का!”
सेठ बंसी फिर से अपनी आंखें बंद करता है और हिम्मत करके पेड़ से थोड़ा और नीचे सरकता है।
बंसी, “भाग्यवान! मैं तो… मैं तो और नीचे आ गया। वैसे मैं क्या सोच रहा था कि 500 ब्राह्मणों को भोजन कराना बड़ा महंगा पड़ेगा। मैं एक काम करता हूं, 200 ब्राह्मणों को भोजन करा दूंगा।”
रज्जो, “ये आप क्या सोच रहे हैं? एक तरफ तो आपको यमराज दिख रहा है और अब आप हिसाब-किताब की बातें सोच रहे हैं।”
बंसी, “तुझे क्या पता पैसे कितनी मेहनत से कमाए और बचाए जाते हैं?, पगली कहीं की!”
धीरे-धीरे करके अंत में सेठ बंसी पेड़ से नीचे आ ही जाता है।
बंसी, “तेरा लाख-लाख शुक्र है भगवान, जो तूने मुझे सही सलामत इस पेड़ से नीचे उतार दिया।”
रज्जो, “हां सेठ जी! यह सब भगवान की ही कृपा है। आपने भगवान से जो मन्नत मांगी है उसे पूरा कीजिएगा।”
बंसी, “हां भाग्यवान! मन्नत तो मुझे पूरी ही करनी होगी।”
पेड़ से उतरने की शुरुआत में सेठ बंसी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने की बात करता है और जमीन पर आते-आते वो हजार ब्राह्मण, एक ब्राह्मण में बदल जाते हैं।
बंसी, “अरे भाग्यवान! एक ब्राह्मण को भोजन कराने में कितना ज्यादा खर्चा आएगा पता है? मुझे एक ऐसा ब्राह्मण ढूंढना होगा जो… जो बहुत कम खाता हो।”
रज्जो, “सेठ जी! ऐसा ब्राह्मण आपको मिलेगा कहां?”
बंसी, “मिलेगा, जरूर मिलेगा भाग्यवान! बस थोड़ा ढूंढना पड़ेगा।”
रज्जो, “लेकिन मेरा मायका… मां बापू जी इंतजार कर रहे होंगे।”
बंसी, “अरे रज्जो! तेरा दिमाग काम नहीं करता क्या? तेरे सामने मैं मरते-मरते बचा हूं, देख नहीं रही?
अब यह मन्नत पूरी करनी होगी। बाद में देखेंगे मायका, पहले-पहले चलकर ब्राह्मण ढूंढना है।”
सेठ बंसी कम भोजन करने वाले ब्राह्मण का पता लगाना शुरू करता है। आखिरकार उसे पड़ोस के गांव में रहने वाले ब्राह्मण वीरपाल के बारे में पता चलता है। सेठ बंसी ब्राह्मण वीरपाल के घर जाता है।
बंसी, “हे ब्राह्मण देवता! आपको कल मेरे घर भोजन पर आना है।”
वीरपाल, “क्या बात है जजमान! आपने भोजन का निमंत्रण दिया?”
बंसी, “जी ब्राह्मण देवता! मैं एक बड़े संकट में फंस गया था और मैंने उस समय एक ब्राह्मण देवता को भोजन कराने की मन्नत मांग ली थी।
बस इसी कारणवश मैं आपको अपने घर पर भोजन पर आमंत्रित करने आया हूं।”
वीरपाल, “ठीक है जजमान! मैं कल आपके घर भोजन पर आ जाऊंगा।”
वीरपाल ब्राह्मण बड़ा ही चालाक और धूर्त ब्राह्मण था। उसने सेठ बंसी की कंजूसी के बारे में पहले ही सुन रखा था।
बंसी, “भाग्यवान! मैंने कल के भोजन के लिए ब्राह्मण देवता को निमंत्रण तो दे दिया है। लेकिन मैं यह भूल गया कि कल मुझे बहुत जरूरी काम से दूसरे गांव जाना है।”
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रज्जो, “सेठ जी! आप नहीं रहेंगे तो ब्राह्मण देवता की सेवा कैसे होगी?”
बंसी, “तुम मेरी अर्धांगिनी हो भाग्यवान! मतलब मेरा आधा अंग हो। इसलिए सेवा तुम करो या मैं करूं, बराबर ही है।”
रज्जो, “ठीक है सेठ जी! अगर आपका जाना बहुत जरूरी है तो आप जाइए।”
बंसी, “वो ब्राह्मण देवता भोजन कम खाते हैं, तो तुम ज्यादा भोजन मत पकाना।
और भोजन में एक सब्जी, थोड़ी सी पूरी, दही, चूड़ा और गुड़ परोस देना। इससे ज्यादा कुछ पकाने की या परोसने की जरूरत नहीं है, समझी?”
रज्जो, “ठीक है सेठ जी! जैसा आप कहेंगे मैं वैसा ही करूंगी।”
दूसरे दिन सुबह सेठ बंसी जल्दी ही दूसरे गांव निकल पड़ता है। उसके जाने के थोड़ी देर बाद ही वीरपाल ब्राह्मण सेठ बंसी के घर आते हैं।
रज्जो, “ब्राह्मण देवता प्रणाम! आप इतनी सुबह आ गए?”
वीरपाल, “हम तो मंदिर से दर्शन करके अपने घर को जा रहे थे, तभी सेठ बंसी को बड़ी जल्दबाजी में कहीं जाते हुए देखा।
इसलिए यहां पर आए जजमान, कि अगर आपको सहायता या सलाह की जरूरत पड़ी तो कौन करेगा?”
रज्जो, “आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ब्राह्मण देवता जो आप यहां आए। मैं भोजन का पूरा प्रबंध आपके अनुसार कर रही हूं। यदि आपकी कोई और इच्छा है तो बता दीजिए।”
वीरपाल ब्राह्मण तो यही देखने आए थे कि उनके भोजन की क्या व्यवस्था चल रही है।
वीरपाल, “देवी! आप बहुत समझदार हैं। लेकिन आपने यह पूछकर और भी समझदारी का काम किया है।
वैसे तो मन्नत एक ब्राह्मण को भोजन कराने की ही है, लेकिन आप 10 से 12 लोगों के अनुसार भोजन पकाइए। भोजन में क्या-क्या पकाना है यह तो आपको पता ही होगा?”
रज्जो, “ब्राह्मण देवता! पूरी, सब्जी, दही, चूरा और गुड़, यह बन रहा है भोजन में।”
वीरपाल, “अच्छा! बहुत अच्छा देवी! आप तो बड़ी ही कुशल गृहिणी हैं। आपने तो सब कुछ पहले से ही तय कर रखा है।
लेकिन अगर विघ्न हरने वाले विघ्नहर्ता श्री गणेश जी को खुश करने के लिए चार तरह के मोदक और लड्डू रखे जाएं तो बहुत ही उत्तम होगा।
जब भगवान को खुश करना ही है, तो फिर अपने कुलदेवी और देवता को भी क्यों ना खुश किया जाए?”
रज्जो, “ब्राह्मण देवता! आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। जैसा आप कह रहे हैं, वैसा ही होगा।”
वीरपाल ब्राह्मण अपने घर वापस चले जाते हैं। और दोपहर होते-होते भोजन करने के लिए सेठ बंसी के घर वापस आते हैं।
वीरपाल, “देवी! भोजन तो तैयार हो ही गया होगा। अब सबसे पहले हम देवी-देवता को संतुष्ट करते हैं।”
रज्जो, “जी ब्राह्मण देवता! जैसी आपकी आज्ञा।”
रज्जो पकाया हुआ भोजन लाकर रखती है और एक दिया जलाकर रख देती है।
वीरपाल, “देवी! आप तो बहुत ही समझदार हैं। शास्त्रों में भोजन परोसने का यही तरीका बताया गया है।”
रज्जो, “ब्राह्मण देवता! भोजन शुरू करें।”
वीरपाल, “देवी! बाकी तो सब ठीक है, लेकिन इसमें सोने के दो सिक्कों की कमी है। शास्त्रों के अनुसार भोजन के साथ दो सोने के सिक्के रखना बहुत ही जरूरी है।”
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रज्जो, “सेठ जी ने तो इसके बारे में कुछ नहीं कहा, लेकिन अगर शास्त्रों में ऐसा लिखा है तो यह करना भी जरूरी है।”
रज्जो ब्राह्मण देवता से कोई बहस नहीं करती और दो सोने के सिक्के लाकर वहां रख देती है। वीरपाल ब्राह्मण भोजन शुरू करते हैं और पेट भर कर खाते हैं।
और उसके बाद सारा बचा हुआ भोजन एक कपड़े की पोटली में बांध लेते हैं और दो सोने के सिक्के उठाकर अपनी जेब में रखते हैं।
वीरपाल, “देवी! भोजन बहुत ही स्वादिष्ट था। यह ब्राह्मण सेठ बंसी जी और उसके परिवार से बहुत ही प्रसन्न है।
भगवान तुम दोनों पर अपनी कृपा बरसाए। अब बस जल्दी से हमारी दक्षिणा ले आओ।”
रज्जो, “दक्षिणा? कैसी दक्षिणा ब्राह्मण देवता?”
वीरपाल, “देवी! जब आप किसी ब्राह्मण को भोजन कराते हैं तो वो भोजन तब तक पूरा नहीं होता जब तक आप भोजन कराने के बाद उस ब्राह्मण को दो सोने की मोहर दक्षिणा में नहीं देते।
देवी! आप तो इतनी कुशल गृहिणी हैं, इस नियम के बारे में तो सब जानते हैं। क्या आप नहीं जानतीं?”
रज्जो जानती है कि सेठ बंसी कभी भी दक्षिणा में दो सोने की मोहर देने को तैयार नहीं होंगे। पर वह सोचती है कि अगर यह नियम है और शास्त्रों में लिखा है, तो यह तो हमें देना ही होगा।
फिर वह दो सोने की मोहरे लाकर वीरपाल ब्राह्मण को दे देती है और वीरपाल ब्राह्मण खुशी-खुशी वहां से अपने घर चले जाते हैं।
घर जाकर वीरपाल ब्राह्मण अपनी पत्नी से कहते हैं, “ये लो भोजन की पोटली, जल्दी से भोजन कर लो।
मैं सोने जा रहा हूं। थोड़ी देर में सेठ बंसी बहुत गुस्से में आएगा। अब तुम मेरी बात ध्यान से सुनो।”
वीरपाल ब्राह्मण अपनी पत्नी से उसके कान में कुछ कहते हैं और घर के अंदर सोने चले जाते हैं।
उन्होंने इतना ज्यादा भोजन किया होता है कि थोड़ी देर में ही वो खर्राटे लेने लगते हैं और गहरी नींद में सो जाते हैं। दूसरी तरफ सेठ बंसी घर वापस आता है।
बंसी, “भाग्यवान! हो गया ब्राह्मण देवता का भोजन? वो प्रसन्न तो होकर गए?”
रज्जो, “जी सेठ जी! वो तो बहुत प्रसन्न होकर गए, परंतु…”
बंसी, “परंतु क्या?”
रज्जो डरते हुए सेठ बंसी को सारी बातें बताती है और सेठ बंसी गुस्से में वीरपाल ब्राह्मण के घर डंडा लेकर पहुंच जाता है।
और जोर-जोर से चिल्लाने लगता है, “अरे ठग कहीं के! कहां है तू?”
वीरपाल ब्राह्मण की पत्नी जोर से चिल्लाती हुई रोती है।
पत्नी, “अरे दुष्ट पापी! तू कौन से जन्म का बदला मेरे पंडित जी से लेने आया है? तुमने अपने घर भोजन के लिए बुलाकर उस भोजन में जहर मिला कर दे दिया!
तुम्हारे घर का भोजन करने के बाद मेरे पंडित का क्या हाल हो गया है? अगर मेरे पंडित जी को कुछ हो गया तो कोतवाली में तुम्हारी शिकायत करूंगी, तुम्हें जेल में बंद करवा दूंगी!”
बंसी, “अरे! आप पहले धीरे बोलिए। क्या हो गया ब्राह्मण देवता को?”
पत्नी, “अगर मेरे पंडित जी को कुछ हो गया तो मेरा और मेरे बच्चों का क्या होगा? उन्हें कौन देखेगा, पापी!”
इतना सब सुनते ही सेठ बंसी की तो डर के मारे हालत खराब हो गई और वह डर में सब कुछ भूल गया।
बंसी, “क्या हो गया ब्राह्मण देवता को? आपने… आपने डॉक्टर को नहीं बुलाया उन्हें देखने के लिए?”
पत्नी, “डॉक्टर को बुलाने के लिए पैसे कहां हैं हमारे पास? एक कौड़ी भी नहीं है। हम कहां से डॉक्टर को घर पर बुलाकर इलाज करेंगे?”
बंसी, “आप चिंता मत कीजिए! इलाज का खर्च मैं देता हूं। अच्छा! चिंता मत कीजिए। “
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पत्नी, “अभी के अभी हमें इलाज के लिए 10 सोने के सिक्के लाकर दो। अगर मेरे पंडित जी को बिना इलाज के कुछ हो गया तो मैं पुलिस के पास जाऊंगी, तुम्हें जेल करवाऊंगी!”
बंसी, “नहीं-नहीं, इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। आप मेरे साथ किसी को भेज दीजिए, मैं अभी पैसे भिजवाता हूं। जल्दी से डॉक्टर को बुलवाकर पंडित जी का इलाज शुरू करवाइए।”
वीरपाल पंडित की पत्नी अपने बेटे को सेठ बंसी के साथ उसके घर भेजती है और सेठ बंसी वीरपाल पंडित के बेटे के हाथ में 10 सोने के सिक्के देता है।
बंसी, “बेटा! यह सिक्के लो और जल्दी अपनी मां के पास जाओ। और डॉक्टर को बुलाकर ब्राह्मण देवता का अच्छा सा इलाज करवाओ। अच्छा… उन्हें कुछ नहीं होना चाहिए, ठीक है?”
रज्जो, “क्या हो गया सेठ जी, क्या बात है?”
बंसी, “अरे! गुस्से में सब सत्यानाश हो गया भाग्यवान। तूने ब्राह्मण देवता के खाने में जहर डाल कर दे दिया और इसकी वजह से जेल मुझे जाना होगा।
भाग्यवान! बस किसी तरह वीरपाल ब्राह्मण की जान बचा लो, मैं 1000 ब्राह्मणों को भोजन कराऊंगा!”
बाहर खड़ा वीरपाल ब्राह्मण का बेटा यह सारी बातें सुन लेता है और घर जाकर वो वीरपाल ब्राह्मण और उनकी पत्नी से कहता है।
बेटा, “बधाई हो पिताजी! आपके प्राणों के बदले सेठ ने फिर से 1000 ब्राह्मणों को भोजन कराने की एक नई मन्नत मान ली है।”
दोस्तो ये Funny Story आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!

