हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” ईमानदार मछुआरा ” यह एक Bedtime Story है। अगर आपको Bedtime Stories For Adults, Hindi Kahani या Achhi Achhi Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।
रूपनगर में रहने वाला भीमा अपनी पत्नी कमला और छह महीने की बेटी रोमा के साथ रहता था।
वो रोज नदी से मछलियां पकड़ कर लाता और उन्हें बाजार में बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था।
एक दिन भीमा अपनी पत्नी से बोला।
भीमा, “आज थोड़ी तबीयत ठीक नहीं लग रही है… मैं सोच रहा हूं कि नदी पर ना जाऊं और घर पर आराम कर लूं।”
कमला, “तुम्हें तो कभी सर दर्द होता है, कभी पैर दर्द! सिर्फ काम पर ना जाने का बहाना देखते हो।”
भीमा, “नहीं कमला! मैं सच कह रहा हूं, आज तबीयत ठीक नहीं लग रही।”
कमला, “ठीक है मत जाओ, आज मेरी भी तबीयत खराब है। मैं भी घर का कोई काम नहीं करूंगी, सिर्फ आराम करूंगी।”
भीमा, “अच्छा-अच्छा तुम नाराज मत हो, काम पर जाता हूं।”
भीमा सीधा-साधा था और कमला उतनी ही खराब। वह भीमा से लड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी।
भीमा नदी के तट पर मछलियों के लिए जाल डालकर बैठा था और खुद से बातें कर रहा था।
भीमा, “ना जाने कमला कब सुधरेगी? वो कभी मेरी तकलीफ नहीं समझती, उसे तो सिर्फ पैसा चाहिए।
जिस दिन मैं नहीं रहूंगा, उस दिन उसे समझ आएगा। लगता है जाल में मछलियां आ गई हैं।
चलो इन्हें निकालता हूं और बाजार में बेचकर पैसे ले जाकर कमला को देता हूं, नहीं तो वह मुझे जीने नहीं देगी।”
भीमा जाल से मछलियां निकाल ही रहा होता है कि उसकी नजर नदी में बहती हुई एक टोकरी पर पड़ती है जिसमें एक बच्चा होता है। भीमा टोकरी को नदी से बाहर निकालता है।
भीमा, “कोई है? अरे! यह बच्चा किसका है? न जाने कौन इतने छोटे से बच्चे को इस टोकरी में डालकर नदी में छोड़ गया, भाई?
अरे! कैसे लोग हैं दुनिया में? एक काम करता हूं, इसे अपने साथ घर ले चलता हूं, नहीं तो यह मर जाएगा।”
भीमा घर पहुँचता है।
भीमा, “कमला, कहां हो? देखो मैं क्या लाया हूं?”
कमला, “इतना शोर क्यों मचा रखा है? आज तुमने नदी से घर आने में देर कर दी। कब बाजार जाओगे? कैसे पैसे लेकर आओगे?”
भीमा, “तुम्हें तो सिर्फ पैसों की ही पड़ी रहती है। यह देखो, आज नदी में किसी ने इस छोटे से बच्चे को एक टोकरी में डालकर छोड़ दिया था।”
कमला, “जिसका बच्चा है अगर उसने छोड़ दिया, तो तुम इसे क्यों ले आए?”
भीमा, “तुम कैसी बातें कर रही हो? अगर मैं इसे घर नहीं लाता तो क्या वहां नदी में मछलियों का चारा बनने के लिए छोड़ देता?”
कमला, “इस बच्चे को मछली खाए या शेर खाए, मुझे क्या करना है? इस मुसीबत को मैं ना रखूंगी अपने घर में।”
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भीमा, “बहुत हो गया कमला! मैंने आज तक तुम्हारी हर बात मानी है और अब तुम मेरी एक बात ध्यान से सुनो…
यह बच्चा इस घर में ही रहेगा और रोमा के साथ हम इसे भी पालेंगे। इस बारे में मुझे कोई बात नहीं करनी है।”
कमला ने भीमा को पहली बार इस तरह गुस्से में बात करते देखा था, इसलिए उसने कुछ नहीं कहा और बच्चे को रखने के लिए तैयार हो गई।
भीमा ने बड़े प्यार से उस बच्चे का नाम सोमा रखा। धीरे-धीरे समय के साथ रोमा और सोमा दोनों बड़े होने लगे।
सोमा, “पिताजी! क्या मैं भी आपके साथ नदी पर मछलियां पकड़ने चल सकती हूं?”
भीमा, “क्यों बेटा? तुम्हें मछलियां पकड़ना सीखना है?”
सोमा, “जी पिताजी! मैं भी आपकी तरह एक मछुआरा बनना चाहती हूं।”
भीमा, “बेटा! अभी तुम छोटी हो। अभी तुम अपनी बहन रोमा के साथ खेलो। जब बड़ी हो जाना तब चलना।”
कमला, “अगर जाना चाहती है तो आप ले क्यों नहीं जाते? अच्छा ही है, पिता का काम सीख लेगी तो आपका काम हल्का हो जाएगा।”
भीमा, “मुझे रोमा और सोमा दोनों को जो कुछ भी सिखाना होगा मैं खुद सिखा लूंगा। तुम्हें मुझे बताने की जरूरत नहीं है।”
कमला, “मैं तो इसलिए कह रही थी कि अगर उसका मन है तो सिखा दो ना… लेकिन जैसा तुम्हें ठीक लगे।”
कमला सोमा को बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। लेकिन भीमा की वजह से वह मजबूर थी।
रोमा का स्वभाव उसकी मां कमला की तरह था, जबकि सोमा स्वभाव में बिल्कुल भीमा जैसी थी—नेक दिल और दयावान।
एक दिन अचानक भीमा की मृत्यु हो जाती है। रोमा और सोमा बहुत दुखी होते हैं।
कमला, “बेटा रोमा! तू रो मत। यह तो नियति है, हम इसे बदल नहीं सकते। तुम्हारे पिता का साथ बस इतना ही लिखा था… तुम्हें हिम्मत रखनी होगी।”
रोमा, “हां मां! लेकिन अब हम कैसे रहेंगे? हमारा घर कैसे चलेगा? पिताजी ही तो अकेले काम करने वाले थे।”
कमला, “तू फिक्र मत कर! यह सोमा है ना? इसने तुम्हारे पिता से मछलियां पकड़ना सीखा था। अब से यह जाएगी मछलियां पकड़ने।”
सोमा, “हां मां! मैं जाऊंगी पिताजी की जगह मछलियां पकड़ने। आप फिक्र मत कीजिए।”
कमला, “बस-बस! ज्यादा प्यार दिखाने की जरूरत नहीं है। तू ही जाएगी और कौन जाएगा?”
उस दिन से सोमा के तो जैसे दिन ही बदल गए। कमला उससे घर का सारा काम करवाती, मछली पकड़ने और घर के लिए पानी लेने नदी पर भेजती,
लेकिन उसे हमेशा खाना बहुत थोड़ा सा देती। एक दिन नदी पर पानी भरने गई सोमा वहां बैठकर रो रही थी।
सोमा, “पिताजी! आप मुझे छोड़कर क्यों चले गए? मुझे आपकी बहुत याद आती है।
आपके सिवा कोई मुझसे प्यार नहीं करता… मां तो मुझे ठीक से खाना भी नहीं देती। मैं क्या करूं पिताजी? आप मुझे कोई रास्ता बताइए।”
लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिलता। वो घर आ जाती है।
कमला, “आ गई महारानी? नदी से पानी भर कर लाने में इतना वक्त लगता है क्या?”
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सोमा, “मां! पानी भरकर मटके भारी होते हैं, इसलिए मैं धीरे-धीरे चलकर आती हूं ताकि पानी गिर ना जाए।”
कमला, “बस कर अपने बहाने! काम-धाम ठीक से करती नहीं, खाना इतना खाती है।”
सोमा, “मां! खाना तो आप मुझे आधा पेट देती हैं।”
कमला, “जवाब देती है मुझे? रुक जा, तेरी अच्छे से मरम्मत करती हूं तब तेरा दिमाग सही होगा।”
रोमा सब देखकर बड़ी खुश होती थी। रोज सोमा नदी किनारे बैठकर पिता को याद करती और खूब रोती।
एक दिन वो नदी किनारे बैठकर रो रही थी, तभी एक बूढ़ी औरत आती है।
बूढ़ी औरत, “बेटा, क्या मुझे थोड़ा पानी पिलाओगी?”
सोमा, “हां अम्मा! जरूर पिलाऊंगी। आप पहले आराम से बैठ जाइए, मैं अपने घड़े से आपको पानी पिला देती हूं।”
सोमा बूढ़ी औरत को उसकी इच्छा अनुसार पानी पिलाती है।
बूढ़ी औरत, “तुम बहुत नेक दिल हो बेटी! तुमने मुझे पानी पिलाया, इसके बदले में मैं तुम्हें कुछ देना चाहती हूं।”
सोमा, “मुझे कुछ नहीं चाहिए, अम्मा।”
बूढ़ी औरत, “क्या तुम्हें किसी चीज की इच्छा नहीं?”
सोमा, “नहीं! मेरे पिताजी ने मुझे सिखाया था कि किसी की मदद बिना किसी लालच के करनी चाहिए।”
बूढ़ी औरत अपने दोनों हाथ जोड़ती है और वह एक परी बन जाती है।
सोमा, “आप कौन हैं? और यह आपने कैसे किया?”
परी, “सोमा! मैं इच्छा परी हूं और मैं अपनी इच्छा से कोई भी रूप ले सकती हूं।”
सोमा, “इच्छा परी? लेकिन आप मेरा नाम कैसे जानती हैं?”
परी, “सोमा, मुझे सब कुछ पता है। तुम रोज यहां बैठकर अपने पिता को याद करती हो और रोती हो।
मैं सब जानती हूं। मैं तुम्हें एक वरदान देती हूं— आज के बाद तुम जब भी रोओगी, तब तुम्हारी आंखों से आंसू की जगह हीरे-जवाहरात गिरेंगे।”
सोमा, “लेकिन मैं उन हीरे-जवाहरातों का क्या करूंगी?”
परी, “तो तुम्हें क्या चाहिए?”
सोमा, “मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
परी, “ठीक है, मैं तुम्हें एक और वरदान देती हूं। तुम्हारी आवाज कोयल जैसी सुरीली हो जाए, तुम्हारा गाना सुनकर इंसान अपने दुखों को भूल जाएगा।”
इतना कहकर परी गायब हो जाती है और सोमा पूरे रास्ते गाना गाती हुई अपने घर वापस आती है।
उसकी आवाज इतनी सुरीली हो चुकी थी कि वह खुद का ही गाना सुनकर खुश हो रही थी। घर आने पर।
कमला, “आ गई महारानी! कहां लगा दी इतनी देर?”
सोमा, “मां! आज नदी पर मुझे एक परी मिली थी।”
कमला, “क्या बकवास कर रही है? भला परियां होती हैं?”
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सोमा, “हां मां! परियां होती हैं।”
कमला, “अपनी बकवास बंद कर! घर का काम देख, घर कैसे गंदा पड़ा है?”
सोमा बर्तन साफ कर ही रही होती है कि उसके हाथ से एक कांच का बर्तन गिर कर टूट जाता है। कमला सोमा को दो थप्पड़ लगाती है।
सोमा रोने लगती है और उसकी आंखों से आंसू की जगह हीरे-जवाहरात गिरने लगते हैं।
कमला, “ये क्या? इसकी आंखों से आंसू की जगह हीरे-जवाहरात गिर रहे हैं!”
रोमा, “हां मां! इसकी आंखों से तो आंसू की जगह हीरे-जवाहरात गिर रहे हैं।”
कमला, “बता कैसे हो रहा है ये सब?”
सोमा खुद को संभालती है।
सोमा, “मां! मैंने आपसे कहा था ना, आज मुझे नदी पर एक परी मिली थी। उस परी ने मुझे आशीर्वाद दिया
कि अब से जब भी मैं रोंगी, मेरी आंखों से आंसू की जगह हीरे-जवाहरात गिरेंगे।”
कमला, “रोमा! आज नदी पर पानी भरने तू जाएगी। वहां बूढ़ी औरत को पानी पिलाकर तू भी वरदान ले आना।”
रोमा, “मैं जाऊंगी नदी पर? लेकिन मटका बहुत भारी होता है, मैं कैसे उठाकर लाऊंगी?”
कमला, “तो यह छोटा सा मिट्टी का बर्तन लेकर जा और बूढ़ी औरत को इससे पानी पिलाना।”
रोमा मिट्टी का बर्तन लेकर नदी किनारे जाती है। परी अपने असली रूप में ही रोमा के सामने आती है।
परी, “बेटा! मुझे पानी पिला दो।”
रोमा, “नहीं-नहीं! यह पानी तो बूढ़ी औरत के लिए है। मैं उसका इंतजार कर रही हूं, उसे ही पानी पिलाऊंगी।”
परी, “तुम कितनी बदतमीजी से बात करती हो! क्या तुम्हारे घर वालों ने तुम्हें तमीज नहीं सिखाई?”
रोमा, “तुम मेरा समय मत खराब करो, यहां से चली जाओ! वैसे ही इतनी दूर चलकर आई हूं, थक गई हूं… ऊपर से तुम मुझे परेशान कर रही हो।”
परी, “तुम सच में बहुत बदतमीज लड़की हो! मैं बददुआ देती हूं, अब से जब तुम अपना मुंह खोलोगी, तुम्हारे मुंह से कौवे की आवाज निकलेगी।”
परी गायब हो जाती है। रोमा रोती-रोती घर जाती है।
कमला, “क्या बात है बेटा? तुम रो क्यों रही हो?”
रोमा जैसे ही मुंह खोलती है, कौवे की आवाज आने लगती है।
कमला, “तुम्हारी आवाज को क्या हुआ?”
रोमा लिखकर कमला को सारी बात बताती है।
कमला, “यह सब इस सोमा की वजह से हुआ है! इसने हमें पूरी बात नहीं बताई होगी… यह जानबूझकर ऐसा करती है।”
सोमा, “नहीं मां! मैंने सब कुछ सच-सच बताया था।”
कमला सोमा को मारकर घर से बाहर कर देती है।
सोमा, “मैं क्या करूं? मां को हमेशा मेरी ही बात गलत लगती है। भला मैं क्यों अपनी बहन का बुरा चाहूंगी?”
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सोमा घर के बाहर पेड़ के नीचे लेट जाती है और गाना गाने लगती है। परी के वरदान से वह अपना सारा दुख भूल जाती है।
तभी वहां से रूपनगर का राजकुमार गुजर रहा होता है। वह सोमा की आवाज सुनकर आता है।
उधर सोमा का गाना सुनकर कमला भी घर का दरवाजा खोल देती है और सोमा को घर के अंदर ले लेती है।
राजकुमार, “अरे! घर में कोई है क्या?”
कमला, “हां! किससे मिलना है? कौन हो तुम?”
राजकुमार, “मैं इस नगर का राजकुमार हूं और यहां पर एक सुरीले गाने की आवाज सुनकर आया हूं। वह गाना कौन गा रहा था?”
कमला अंदर आती है और रोमा को बाहर ले जाकर राजकुमार के सामने खड़ा कर देती है।
कमला, “राजकुमार! यह मेरी बेटी रोमा है, यही गाना गा रही थी।”
राजकुमार, “आपकी आवाज बहुत सुरीली है। आप बहुत अच्छा गाना गाती हैं।
आपकी जादुई आवाज सुनकर मैं अपने सारे दुख भूल गया। क्या आप मुझसे विवाह करेंगी?”
कमला रोमा को चुप रहने का इशारा करती है।
कमला, “जरूर करेगी राजकुमार जी! इसके तो भाग्य खुल गए जो आप स्वयं विवाह का प्रस्ताव लेकर आए हैं।”
राजकुमार और रोमा के विवाह की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। विवाह वाले दिन राज दरबार में सब उपस्थित थे।
मंत्री, “महाराज! आज बड़ा ही खुशी का दिन है। हमारे राजकुमार का विवाह हो रहा है और इस विवाह में शामिल होने के लिए दूर देश के राजा-रानियां और हमारी प्रजा आई हुई है।
अगर आपको उचित लगे तो मैं अपनी प्रजा की तरफ से एक अनुरोध करना चाहता हूं।”
महाराज, “बताइए मंत्री जी, आप क्या कहना चाहते हैं?”
मंत्री, “महाराज! हमारी प्रजा चाहती है कि राजकुमार अपनी होने वाली राजकुमारी के जिस गुण के कायल हैं, उसकी एक झलक उन्हें भी मिले।”
राजकुमार, “जरूर मंत्री जी! आप सब एक बार रोमा की सुरीली आवाज सुन लेंगे तो अपने सारे दुख भूल जाएंगे।”
ये सब बातें सुनकर कमला और रोमा परेशान हो जाती हैं, क्योंकि जब भी राजकुमार रोमा से गाना गाने को कहता तो रोमा सिर्फ अपना मुंह चलाती
और कमला सोमा से गाना गवाती थी। रोमा गाना घूम-घूम कर गाती थी ताकि राजकुमार को शक ना हो। पर आज पोल खुलने वाली थी।
कमला, “महाराज! इतने बड़े राज्य के राजकुमार की होने वाली पत्नी अपनी प्रजा के सामने गाना गाए, क्या यह उचित लगता है आपको?”
महाराज, “बिल्कुल उचित है! हम अपनी प्रजा को हमेशा अपने परिवार की भांति मानते हैं…
और अगर हमारी होने वाली वधु अपने परिवार के सामने अपने गुण को प्रस्तुत करेगी तो इसमें कोई शर्म की बात नहीं है।”
रोमा चुप थी। तभी मंत्री बोले।
मंत्री, “महाराज! प्राणों के लिए जीवन दान मांगता हूं, लेकिन यह लड़की और इसकी मां दोनों ही झूठे हैं। यह कभी किसी के सामने गाना नहीं गाएगी।”
महाराज, “मंत्री जी! आप क्या कहना चाहते हैं?”
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मंत्री, “महाराज! जब राजकुमार ने हमें इस लड़की के बारे में बताया तो मेरे मन में जिज्ञासा हुई।
मैं इस लड़की के घर गया, परंतु मैंने वहां जो देखा वो देखकर मेरे होश उड़ गए।”
महाराज, “आपने क्या देखा मंत्री जी?”
मंत्री, “महाराज! ये लड़की तो बोलती भी कौवे जैसा है। इसकी आवाज कौवे जैसी है!”
राजकुमार, “मंत्री जी! यह आप क्या कह रहे हैं? मैंने खुद रोमा की आवाज सुनी है… और एक बार नहीं कई बार सुनी है, यह बहुत सुरीला गाती है।”
मंत्री, “राजकुमार! मुझे क्षमा कीजिएगा, परंतु आपने जो आवाज सुनी वो रोमा की नहीं बल्कि इसकी बहन सोमा की थी।
मैं सच कह रहा हूं, रोमा तो कौवे की आवाज में बोलती है।”
महाराज रोमा को बोलने का आदेश देते हैं। बेचारी रोमा डर से अपना मुंह खोलती है और जैसे ही मुंह खोलती है,
कौवे की आवाज आने लगती है। सभा में सभी लोग अपने कानों पर हाथ रख लेते हैं।
महाराज, “इस लड़की को गिरफ्तार कर लो और इसे कैदखाने में डाल दो! इसने ना सिर्फ हमारे राजकुमार को धोखा दिया बल्कि हम सबको भी अंधेरे में रखा।”
सोमा, “महाराज! मैं आपके हाथ जोड़ती हूं। भगवान के लिए मेरी बहन को माफ कर दीजिए और इसे कैदखाने में मत डलवाइए। यह सब मेरी गलती है।”
महाराज, “तुम्हारी गलती कैसे?”
सोमा, “अगर मैं गाना नहीं गाती तो राजकुमार को यह धोखा कभी नहीं होता। इसलिए अगर आपको सजा देनी है तो मुझे दीजिए, पर मेरी बहन को छोड़ दीजिए।”
महाराज, “तुम इस राज्यसभा में गाना गाओ। क्या पता तुम भी झूठ ही बोल रही हो?”
सोमा गाना गाना शुरू करती है और वहां उपस्थित सारे लोग अपना सारा गुस्सा और तकलीफ भूल जाते हैं।
महाराज, “राजकुमार! तुमने जो कहा था वह बिल्कुल सत्य था।
इस लड़की की आवाज तो वाकई बहुत सुरीली है… और इसकी आवाज सुनते ही हम सारी बातों को जैसे भूल गए।”
सोमा, “महाराज! अब तो आप मेरी बहन को आजाद कर देंगे?”
महाराज, “हम तुम्हारी बहन को आजाद कर देंगे, परंतु अब हम तुम्हारी बहन रोमा की जगह तुम्हारे सामने अपने पुत्र के विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। क्या तुम्हें यह विवाह स्वीकार है?”
सोमा मां की तरफ देखती है।
कमला, “मुझे माफ कर दो बेटी! मैंने तुम्हारे साथ इतना बुरा व्यवहार किया,
फिर भी आज तुमने रोमा की जगह खुद को कारागार में डालने की बात की। तुम्हारे पिता की बात बिल्कुल ठीक थी… तुम्हारा हृदय सच में हीरे जैसा है।”
कमला, “महाराज! मैं अपनी छोटी पुत्री सोमा का विवाह आपके पुत्र के साथ करने के लिए आपसे अनुरोध करती हूं।
मुझे माफ कर दीजिए, रोमा और सोमा को यह सब करने के लिए मैंने ही कहा था।”
रोमा सोमा के लिए कागज पर लिखती है।
रोमा, “मुझे माफ कर दो! मैंने मां की बातों में आकर गलत व्यवहार किया।
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हमेशा तुम्हें नीचा दिखाया, कभी तुम्हारी मदद नहीं की… फिर भी आज तुमने मेरे लिए जो किया वो मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती।”
सोमा, “तुम्हें माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं, तुम बस मेरे गले लग जाओ।”
सोमा रोमा को गले लगाती है। तभी वहां इच्छा परी आती है।
परी, “रोमा! मुझे देखकर अच्छा लगा कि तुम्हें अपनी गलतियों का एहसास हो गया। इसलिए मैं तुम्हें अपने दिए हुए श्राप से मुक्त करती हूं।”
रोमा पहले की तरह बोलने लगती है। महाराज सोमा और राजकुमार का विवाह करा देते हैं और वह दोनों खुशी-खुशी रहने लगते हैं।
दोस्तो ये Bedtime Story आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!

