वनदेवता | VANDEVTA | Horror Kahani | Ghost Stories | Darawni Kahani | Real Horror Stories in Hindi

व्हाट्सएप ग्रुप ज्वॉइन करें!

Join Now

टेलीग्राम ग्रुप ज्वॉइन करें!

Join Now

हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” वनदेवता ” यह एक Horror Story है। अगर आपको Hindi Horror Stories, Horrible Stories या Darawani Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।


जंगल वो केवल पेड़ों और मिट्टी का संग्रह नहीं है। वो एक जीवित सांस लेता हुआ शरीर है जिसका अपना हृदय होता है।

और उस ह्रदय की सुरक्षा के लिए कुछ शक्तियां सदियों से जागृत रही है। वे शक्तियां जिन्हें मनुष्य ने लालच में आकर मिथक कहना सीख लिया है।

पूर्वी घाट के घने अभैेद्य जंगल में जहां सूर्य की किरणें भी धरती तक पहुंचने से डरती थी।

वहां बंजरिया नामक एक छोटा आदिवासी गांव बसा हुआ था। गांव वाले जंगल के साथ सह अस्तित्व में रहते थे।

उसे पूजते थे। लेकिन अब शहर से आए ठेकेदारों ने उस पवित्र संतुलन को तोड़ने का दुस्साहस किया था।

रात के दूसरे पहर का सन्नाटा था। सिर्फ उल्लूओं की कर्कश आवाज और कभी कभार किसी दूर जंगली जानवर की दहाड़ उस चुप्पी को भंग करती थी।

गांव के मुखिया वृषा अपनी झोपड़ी के बाहर लकड़ियों के ढेर के पास बैठे आंखें बंद किए गहरी सांसे ले रहे थे।

उनकी देह पुरानी थी। पर आंखें ऐसी थी जैसे उन्होंने जंगल के जन्म से लेकर अब तक सब कुछ देखा हो।

एक नौजवान माहिया दौड़ता हुआ उनके पास आया। उसके चेहरे पर पसीना और डर साफ छलक रहा था।

माहिया, “मुखिया जी, ठेकेदार ठेकेदार और उनके मजदूर वे आज रात ही…”

वृषा, “हां माहिया, मैं जानता हूं।”

माहिया, “लेकिन वे इतना अंदर क्यों आ रहे हैं? वे उस सीमा वृक्ष को काटने की बात कर रहे हैं। आप जानते हैं वो पेड़ साकार का आसन है।”

वृषा, “साकार जानता है। वो अपनी सीमाएं खुद तय करता है। जब तक वे उन सीमा को नहीं लांगते तब तक वो चुप रहेगा।”

माहिया, “लेकिन वे अब लगभग वहीं पहुंच गए हैं। शहर के लोग, वे डरते नहीं है। उन्होंने बड़े-बड़े भारी मशीनें लाई है।”

वृषा ने धीरे से अपनी आंखें खोली। उनकी आंखें अब सलेटी नहीं बल्कि गहरे हरे रंग की लग रही थी। जैसे जंगल की छाया उनमें उतर आई हो।

वृषा, “मनुष्य जब लालच में अंधा हो जाता है तो वह सबसे पहले डर को ही त्याग देता है।

पर कुछ चीजें ऐसी होती है जो डर को भी खा जाती है। तुम वापस जाओ और अपने लोगों को अंदर रहने को कहो।”

माहिरा, “और आप..?”

वृषा, “मैं प्रतीक्षा करूंगा उस रात की जब यह जंगल अपना सही रंग दिखाएगा।”

जंगल के पश्चिमी छोर पर जहां पहाड़ी ढलान शुरू होती थी।

वहां ठेकेदार हरिंदर सिंह अपने आदमियों के साथ खड़ा था। उसके सामने खड़ा था वो विशाल सैकड़ों साल पुराना साकार वृक्ष।

हरिंदर सिंह, “जगन्नाथ, कितनी बार कहा है? मशीनें रात में चलाओ। दिन में गांव वाले हंगामा करते हैं। यह पेड़ काटो और सुबह होते-होते इसे ट्रक में लोड करो।”

वनदेवता | VANDEVTA | Horror Kahani | Ghost Stories | Darawni Kahani | Real Horror Stories in Hindi

जगन्नाथ, “मालिक, इस पेड़ को लेकर कुछ अजीब कहानियां है। गांव वाले इसे कुछ कहते हैं।”

हरिंदर सिंह (हंसी), “कुछ कहते हैं… हां भूत प्रेत देवताओं की कहानियां ये सब मूर्ख बनाने के तरीके हैं

ताकि कोई उनकी लकड़ी ना चुराए। अब जल्दी करो। मुझे कल सुबह तक यह पेड़ कटा हुआ चाहिए।”

मजदूरों ने चेंस और मशीनें उठाई। उनकी कर्कश धातुई आवाज ने रात के सन्नाटे को फाड़ दिया। पहली आरी जैसे ही साकार वृक्ष के तने से टकराई

एक अजीब सी गहरी गूंजती हुई आवाज पूरे जंगल में फैल गई। यह आवाज हवा की नहीं थी बल्कि पेड़ के भीतर से निकली हुई लग रही थी।

पहला मजदूर जिसने पेड़ को छुआ था, अचानक चीख पड़ा और अपनी आरी छोड़कर पीछे भागा।

मजदूर, “ये… ये खून है।”

हरिंद्र सिंह पास गया। पेड़ के तने पर जहां आरी का दांत लगा था। वहां से एक गहरा लाल चिपचिपा द्रव बह रहा था।

यह किसी भी सामान्य पेड़ के रस जैसा बिल्कुल नहीं था। यह बिल्कुल ताजा खून जैसा लग रहा था।

हरिंदर सिंह, “अरे मूर्ख! यह लाल चंदन का रस है, बहुत कीमती। बस एक मामूली रंग है। काम शुरू करो।”

जब तीन और मजदूरों ने एक साथ चैन चलाई तो जंगल में अचानक हवा तेज हो गई।

हवा में कोई शीतलता नहीं थी। उसने आंखें खोल दी थी। चैन की आवाज अचानक रुक गई।

एक मजदूर, “अरे लाइटें… लाइटें क्यों बुझ गई?”

जंगल में घना स्या अंधेरा छा गया। मजदूरों के पास सिर्फ उनकी हेलमेट वाली छोटी टॉर्चें थी।

हरिंदर सिंह, “अरे! जनरेटर बंद क्यों हो गया? जगन्नाथ, क्या कर रहे हो?”

जगन्नाथ, “मालिक मुझे नहीं पता सब कुछ ठीक था।”

तभी पास की एक बुलडोजर की हेडलाइट्स अचानक अपने आप जल उठी। लेकिन वे सामने की ओर नहीं बल्कि जंगल की ऊपर की ओर चमक रही थी।

जैसे कोई विशाल चीज उनके ऊपर खड़ी हो। और फिर हेडलाइट्स के घेरे में सबने देखा पेड़ हिल रहे थे

लेकिन यह हवा से हिलना नहीं था। दूर से एक ऐसी आवाज आई जो किसी भी जानवर की नहीं थी। यह आवाज थी चट्टानों के रगड़ने गीली मिट्टी के खिसकने की।

हरिंदर सिंह, “ये क्या मजाक है?”

तभी एक मजदूर जोर से चीखा। उसकी टॉर्च जमीन पर गिर गई और बुझ गई।

मजदूर, “मेरे पैर, मेरे पैर जमीन खींच रही है।”

इससे पहले कि कोई और कुछ समझ पाता। उस मजदूर के पैर घुटनों तक मिट्टी में धंस गए।

वो चिल्ला रहा था। छटपटा रहा था। लेकिन मिट्टी उसे किसी दलदल की तरह बहुत तेजी से निकल रही थी।

मजदूर, “भागो मालिक। ये, ये साकार है।”

वनदेवता | VANDEVTA | Horror Kahani | Ghost Stories | Darawni Kahani | Real Horror Stories in Hindi

हरिंदर सिंह और बचे हुए मजदूर अंधेरे में भाग रहे थे। पीछे सिर्फ मजदूर की दबी हुई चीखें आ रही थी जो तेजी से मिट्टी में समा गई थी।

भागते-भागते हरिंदर एक घनी लता से उलझ कर गिरा। जैसे ही उसने उठने की कोशिश की, उसने महसूस किया कि लताओं और झाड़ियों ने उसके पैरों को जकड़ लिया है।

वे लताएं सामान्य नहीं थी। वो बहुत मोटी और सख्त थी जैसे चमड़ी से ढकी हुई नसें हो।

हरिंदर सिंह, “अरे! हटाओ, ये क्या है?”

तभी उसके सामने जहां घना अंधेरा था वहां एक आकृति बनी। यह कोई ठोस शरीर नहीं था। यह घनी पत्तों और काई से बनी मानव जैसी चीज थी।

उसकी आंखें नहीं थी बल्कि वहां दो गहरे गड्ढे थे जहां से हरा मटमैला प्रकाश निकल रहा था। उसका शरीर विशाल था।

जैसे कोई पेड़ों के तने आपस में बुने हुए हो। उसके हाथों में शाखाओं की तरह नुकीले सिर थे।

यह साकार था, जंगल का देवता जिसके क्रोध की कथाएं सिर्फ आदिवासियों की कहानियों में थी। आज सच में जीवित खड़ा था।

साकार, “तुमने मेरे शरीर को काटा। तुमने मेरे हृदय से रक्त बहाया।”

साकार के मुंह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी। यह आवाज जंगल के हर पत्ते, हर मिट्टी के कण और हर काई की परत से आ रही थी। हरिंदर के मस्तिष्क के अंदर गूंज रही थी।

हरिंदर सिंह, “मुझे नहीं पता था। मैं मैं माफी मांगता हूं।”

साकार ने अपना विशाल हाथ उठाया। उसके हाथों की शाखाएं हरिंदर की ओर बढ़ी।

लेकिन वो उसे छूने के बजाय उसके पास की जमीन में धंस गई और फिर जमीन खुल गई। यह जमीन का खुलना नहीं था।

यह सैकड़ों हजारों छोटी-छोटी जड़े थी जो मिट्टी से बाहर निकल आई।

ये जड़े एक साथ एक लहर की तरह हरिंदर की ओर बढ़ी। वे जड़े बहुत तेजी से हरिंदर के कपड़ों के अंदर उसकी त्वचा के नीचे घुस गई।

हरिंदर सिंह, “आह! ये क्या है?”

साकार, “तुम काटने आए थे। अब तुम भी पेड़ की तरह उगोगे।”

जड़े हरिंदर के भीतर घुसकर उसके शरीर के आर-पार हो गई। वो किसी पेड़ की तरह जमीन में गढ़ने लगा।

कुछ ही क्षणों में जहां हरिंदर खड़ा था वहां एक विकृत लाल काले रंग का तना दिखने लगा। वो अब ना पूरी तरह से इंसान था ना पूरी तरह से पेड़।

बाकी बचे हुए मजदूर जो यह सब देख रहे थे डर के मारे भाग गए। लेकिन जंगल की सीमा तक पहुंचते-पहुंचते उनमें से एक ने पाया कि उसके बाल अचानक लंबे घने काई जैसे हो गए थे।

दूसरे के हाथों से छोटी-छोटी पत्तियां निकलने लगी थी। साकार ने उन्हें जंगल की जीवित चलती फिरती डरावनी रक्षक सेना में बदल दिया था।

अगली सुबह सूरज की किरणें जब बंजरिया गांव पर पड़ी तो सब जगह शांति थी। कोई मशीन की आवाज नहीं थी।

कोई चीख नहीं थी। वृषा मुखिया अपनी झोपड़ी के बाहर शांत बैठे थे। माहिया डरते-डरते लौटा।

वनदेवता | VANDEVTA | Horror Kahani | Ghost Stories | Darawni Kahani | Real Horror Stories in Hindi

माहिया, “मुखिया जी, वे चले गए। उनकी मशीनें वहीं पड़ी हैं। खून के धब्बे हैं लेकिन लेकिन कोई इंसान नहीं है। बस सिर्फ नए अजीब पेड़ उग आए हैं वहां।”

वृषा, “माहिया, साकार ने अपना न्याय कर दिया।”

माहिया, “लेकिन साकार कहां है? किसी ने उसे नहीं देखा।”

वृषा उठे। उन्होंने धीरे से अपने हाथ की उंगलियों को देखा। उनकी उंगलियों के नाखून मिट्टी के रंग के थे और उनकी हथेली पर एक गहरा पुराना सा काई का थप्पा था।

वृषा, “साकार को देखने की जरूरत नहीं है। साकार हमेशा से यहां था।”

उन्होंने धीरे-धीरे उस साकार वृक्ष की दिशा में चलना शुरू किया। जिसे हरिंदर काटने आया था। माहिया उनके पीछे पीछे गया।

वृषा उस विशाल तने के पास पहुंचे जहां कल रात लाल रंग का रस निकला था।

उन्होंने अपना हाथ तने पर रखा और फिर एक भयानक धीमी दबी हुई आवाज वृषा के मुंह से निकली

लेकिन यह आवाज उनकी नहीं थी। यह साकार की थी जो अब उनके भीतर गूंज रही थी।

वृषा, “यह जंगल मेरा शरीर है। और मैं, मैं वो हूं जो इस शरीर की रक्षा के लिए सदियों से प्रतीक्षा कर रहा था।”

माहिया पीछे हट गया। उसकी आंखें भय से चौड़ी थी।

माहिया, “मुखिया जी आप…?”

वृषा, “जब शहर के लोग पहली बार आए तो मेरे पास केवल एक ही रास्ता था। उन्हें रोकना।

आदिवासियों को लगा कि वृषा उनकी रक्षा कर रहा है। लेकिन असल में मैं ही वृषा हूं।”

वृषा ने अपने हाथ से उस तने के खून को छुआ और जैसे ही उन्होंने छुआ उनकी आंखें जो पहले हरे रंग की थी, अब वापस सामान्य सलेटी हो गई। वृषा वापस आ गए थे।

वृषा, “हर मुखिया जब वो बूढ़ा होता है तो वो अपनी आत्मा अपनी चेतना साकार को दे देता है।

यही हमारा अनुष्ठान है। मैं ही वो शरीर हूं जिसका उपयोग साकार जंगल की रक्षा के लिए करता है। मैं उसकी जीवित मुखौटा हूं।”

वृषा ने अपनी उंगलियों पर लगे खून को माहिया की ओर बढ़ाया।

वृषा, “अब यह तुम्हारी बारी है माहिया। शहर के लोग फिर से आएंगे और जब वे आएंगे…”

वृषा के होठों पर एक ऐसी भयानक मुस्कान थी जिसमें ना तो इंसानियत थी और ना ही खुशी सिर्फ जंगल की गहरी अनंत भूख थी।

वृषा, “तुम तैयार रहना, मेरे उत्तराधिकारी।”

माहिया ने पीछे मुड़कर देखा गांव में सन्नाटा था सिर्फ जंगल की आवाजें थी जो अब पहले से ज्यादा गहरी तेज और सचेत लग रही थी।

वनदेवता | VANDEVTA | Horror Kahani | Ghost Stories | Darawni Kahani | Real Horror Stories in Hindi

उसने डरते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया। जैसे उसकी उंगलियों ने वृषा की खून लगी उंगलियों को छुआ।

जंगल का देवता कभी मरता नहीं। वो सिर्फ शरीर बदलता है और न्याय हमेशा होता रहता है।


दोस्तो ये Horror Story आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!


Leave a Comment

लालची पावभाजी वाला – Hindi Kahanii ईमानदार हलवाई – दिलचस्प हिंदी कहानी। रहस्यमय चित्रकार की दिलचस्प हिंदी कहानी ससुराल में बासी खाना बनाने वाली बहू भैंस चोर – Hindi Kahani