मूर्ख बीवी | MURKH BIWI | Family Story | Pati Patni Ki Kahani | Parivar KI Kahani | Husband Wife Story in Hindi

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हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” मूर्ख बीवी ” यह एक Family Story है। अगर आपको Family Stories, Husband Wife Stories या Rishto Ki Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।


किसी गांव में रमेश और सुनीता रहती थी। उन दोनों की नई-नई शादी हुई थी। 

सुनीता पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन रमेश शहर में एक आईटी कंपनी में इंजीनियर था। 

रमेश को सुनीता बिल्कुल भी पसंद नहीं थी, लेकिन रमेश के माँ-बाप के ज़ोर डालने पर रमेश को सुनीता से शादी करनी पड़ी।

शादी की छुट्टियां खत्म होने के बाद रमेश को वापस ऑफिस जाना था, लेकिन सुनीता की ऐसी हालत देखकर वो मन में सोचता है 

कि अगर इसे शहर लेकर गया, तो मेरे ऑफिस के दोस्त सुनीता से मिलने के लिए बोलेंगे।

लेकिन ऐसी गँवार लड़की को मैं अपने दोस्तों से नहीं मिलवा सकता हूं। 

और रमेश घर में कोई बहाना बनाकर सुनीता को गांव में ही छोड़कर वापस शहर चला जाता है।

सुनीता को अकेले छोड़कर रमेश को जाता देख सुनीता बहुत रोती है। तब रमेश सुनीता से झूठ कहता है,

रमेश, “सुनीता, मैं तुमको लेकर शहर नहीं जा सकता हूँ क्योंकि शहर में मेरे अकेले रहने के लिए जगह नहीं है। 

फिर मैं तुमको वहाँ कैसे रखूँगा? सुनीता, तुम चिंता मत करो, मैं जल्दी से तुमको शहर में बुला लूँगा।”

ऐसा कहकर रमेश सुनीता को छोड़कर शहर चला जाता है। और वहाँ गांव में सुनीता अकेले अपने कमरे में रोती रहती है।

ये सब सुनीता के सास-ससुर देखते हैं। सुनीता रोज़ रमेश के लिए कमरे में अकेले रोती रहती।

फिर सुनीता का ससुर उसे शहर में रमेश के पास ले जाता है। बस में बैठकर सुनीता बहुत उत्साह से शहर के रहन सहन को देखती है। 

रात को जब रमेश ऑफिस से वापस घर आता है, तो सुनीता को देखकर वह हैरान हो जाता है। फिर रमेश से उसका बाप बोलता है,

रमेश का पिता, “तू बहू को गांव में छोड़कर यहाँ आ गया था। वहाँ अकेले इसका तेरे बिन रो-रोकर बुरा हाल था, 

इसलिए तेरी माँ और मैंने इसे यहाँ तेरे पास लाने का फैसला लिया। अब तुम दोनों यहाँ आराम से रहो।”

ऐसा कहकर उसका बाप सुनीता को रमेश के पास छोड़कर वापस गांव चला जाता है। एक दिन रमेश परेशान होकर सोचता है,

रमेश (सोचते हुए), “अगर इसके बारे में मेरे ऑफिस के दोस्तों को पता लग गया, तो उसकी बहुत बेइज्जती होगी।”

और इसलिए वो सुनीता को घर से बाहर नहीं लेकर जाता था।

एक दिन रात को काम से आने के बाद सुनीता बाहर जाने की जिद करती है,

सुनीता, “सुनिए जी, आप मुझे कभी बाहर नहीं लेकर जाते हैं। आज आप मुझे बाहर खाना खिलाने के लिए लेकर जाइए ना।”

सुनीता के बहुत कहने पर रमेश सुनीता को बाहर खाना खाने के लिए लेकर जाने को तैयार हो जाता है।

रमेश, “अच्छा ठीक है। जाओ जल्दी से तैयार होकर आओ, फिर हम बाहर खाना खाने जाएंगे। और हाँ, सही से तैयार होकर आना।”

सुनीता तैयार हो जाती है और बिल्कुल गांव की तरह तैयार होकर आती है।

सुनीता, “चलिए जी, मैं तैयार हूँ।”

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रमेश, “तुम ऐसे बाहर जाओगी मेरे साथ? हाल देखा तुमने अपना? कैसी लग रही हो? हम कहीं नहीं जा रहे। जाओ-जाओ अपने कमरे में।”

सुनीता, “आप मुझे लेकर जा रहे हो या मैं अभी बाबूजी को फ़ोन करूँ?”

रमेश अपने माँ-बाप की बहुत इज्जत करता था और उनकी हर बात को मानता था। इसलिए सुनीता रमेश को उसके बाप को फ़ोन करने के लिए कहती है।

रमेश, “अच्छा-अच्छा ठीक है, चलो तुम ऐसे ही। लेकिन एक बात सुन लो, तुम बाहर जाकर मेरी बेइज्जती मत करवाना।”

ऐसा कहकर रमेश सुनीता को बाहर खाने पर ले जाता है। होटल पहुंचते ही सुनीता अजीब हरकतें करने लगती है।

क्योंकि उसने ऐसी जगह कभी नहीं देखी थी। वो सब चीजों को देखकर हैरान होती है।

होटल में बैठकर सभी लोग उसे देखने लगते हैं और ये देखकर रमेश को बेइज्जती सी महसूस होती है।

फिर वो सुनीता को गुस्से से कहता है,

रमेश, “सुनीता, तुम आराम से नहीं खाना खा सकती हो? गँवारों की तरह व्यवहार कर रही हो? इसलिए मैं तुम्हें कहीं लेकर नहीं जाता हूँ। 

मेरी बेइज्जती क्यों करवा रही हो? देखो, तुम्हारी वजह से सब हमें कैसे देख रहे हैं?”

सुनीता, “आप ही बताइए ना, मैंने क्या किया है? मैं तो बस यहाँ की चीज़ों को देख रही हूँ।”

रमेश, “चलो बहुत हो गया खाना, अब घर चलो। वैसे तुमने मेरी बहुत बेइज्जती करवा दी है।”

सुनीता, “रुकिए ना, थोड़ी देर में चलते हैं। वैसे भी आप मुझे कहीं बाहर लेकर नहीं जाते।”

रमेश, “मैंने तुमसे कहा ना कि अभी उठो और घर चलो।”

ऐसा कहकर रमेश और सुनीता घर जा ही रहे होते हैं कि तभी रमेश के दोस्त उसे उसी होटल में मिल जाते हैं और रमेश के साथ सुनीता को देखकर हैरान हो जाते हैं।

दोस्त, “अरे रमेश! तेरे साथ ये लड़की कौन है? अरे ये… नहीं-नहीं, तू बता, यहाँ कैसे?”

तभी सुनीता कहती है,

सुनीता, “हम इनकी पत्नी सुनीता हैं और ये हमारे पति हैं।”

ऐसा सुनकर सब हैरान हो जाते हैं और सुनीता को देखकर आपस में हँसने लगते हैं। ये सब देखकर रमेश को शर्मिंदगी महसूस होती है।

दोस्त, “अरे रमेश! तूने बताया नहीं तेरी शादी हो चुकी है? चल कभी हमें भी भाभी के हाथों का खाना खिला। हमें भी डिनर पर घर बुला कभी।”

सुनीता, “हाँ भाई साहब, क्यों नहीं? आप कल घर पर आ जाइए।”

‘भाई साहब’ सुनकर रमेश के सारे दोस्त हँसने लगते हैं कि तभी बात को काटते हुए रमेश कहता है,

रमेश, “हाँ-हाँ, क्यों नहीं? कल ही तुम सब खाना खाने घर आ जाओ।”

ऐसा कहकर सभी अपने-अपने घर चले जाते हैं। घर आकर रमेश सुनीता पर बहुत गुस्सा करता है 

और सोचता है कि अब ऑफिस में सब लोग उस पर हँसेंगे, उसका मजाक उड़ाएंगे।

रमेश (सोचते हुए), “अब मैं क्या करूँ और कल डिनर पर अपने दोस्तों को क्या खाने को दूँगा? इसे तो चाइनीज में कुछ बनाना भी नहीं आता है।”

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ऐसा सोचकर वो सो जाता है और सुबह होते ही वह सुनीता को खाने में क्या-क्या बनाना है, अच्छे से समझाकर ऑफिस चला जाता है।

शाम को जब वो घर पर अपने दोस्तों को लेकर आता है, तो सीधा किचन में जाकर सुनीता से कहता है,

रमेश, “सुनीता, मैंने तुझे जो बताया था, तूने वो सब अच्छे से बना दिया ना? मेरे दोस्तों के सामने मेरी बेइज्जती मत करवा देना।”

सुनीता, “नहीं जी, आपको मुझ पर भरोसा नहीं है? आपने जो-जो बनाने को कहा था, मैंने वो सब बना दिया। देखना, आप भी मेरी तारीफ करोगे।”

रमेश, “ठीक है, खाना बाहर ले आओ। मेरे सभी दोस्त आ गए हैं।”

सुनीता खाना लेकर बाहर आती है और सबको खाना परोसने लगती है। फिर सब खाना खाना शुरू करते हैं। 

कोई पिज़्ज़ा खाता है, तो कोई बर्गर खाता है। जैसे ही वो लोग खाते हैं, तभी उल्टी कर देते हैं।

दोस्त, “अरे भाई! खिलाना नहीं था तो साफ मना कर देता। ये क्या बनाया है? पिज़्ज़ा में इतना सारा नमक कौन डालता है?”

दूसरी दोस्त, “हाँ रमेश, और ये बर्गर में चीज़ की जगह ये मक्खन डाला हुआ है। बुलाना नहीं था तो साफ कह देते ना।”

ऐसा कहकर वो सब खाना छोड़कर गुस्से में वहाँ से चले जाते हैं।

रमेश, “सुनीता, ये क्या किया तूने? मैंने तुझे सुबह सब समझाया था, फिर भी तूने ये क्या बनाया है? 

तुझे पता है, मेरी कितनी बेइज्जती हो गई है? सिर्फ तेरी वजह से मैं किसी को भी मुँह दिखाने लायक नहीं बचा।”

ये सब देखकर सुनीता को अपनी मूर्खता का अहसास हो जाता है। उसे समझ आ जाता है कि हर काम सबके बस का नहीं होता है। 

अगर वह समझदारी से काम करती, तो आज उसके पति की सबके सामने बेइज्जती नहीं होती।


दोस्तो ये Family Story आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!


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