हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” लालची अचारवाली ” यह एक Hindi Story है। अगर आपको Hindi Stories, Hindi Kahani या Achhi Achhi Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।
चंदन नगर गांव की सबसे उम्रदराज महिला विमला काकी अपनी विधवा बहू सुमन और पोती मीना के साथ रहती थी। सूखी लकड़ियां बेचकर गुजारा चलता था इनका।
विमला काकी, “बहू, कुछ खाने को है? आज बहुत दिन हो गए रात का खाना खाए।”
सुमन, “नहीं मां जी। बरसात के कारण भीगी लकड़ियां बिकती ही नहीं।”
विमला काकी, “चल मीना, आज रात भी पानी पीकर ही सोना पड़ेगा। कल तुम्हारे दादा की 50वीं बरसी है,
कल ही के दिन तुम्हारे दादा जी की मृत्यु हुई थी। कल हम नदी में स्नान करने चलेंगे।”
मीना, “दादी! क्या हम लोग गरीब ही मर जाएंगे?”
विमला काकी, “ऐसा नहीं बोलते बेटा! भगवान के घर में देर है पर अंधेर नहीं।”
मीना, “रहने दो दादी! अब मैं बच्ची नहीं रही। कुछ नहीं बदलने वाला, हमारा भाग्य ही खराब है।”
दूसरे दिन तीनों नदी पर स्नान करने जाते हैं।
मीना, “दादी मां! वो देखो भूतिया आम का पेड़… उस पर मंजरी!”
विमला काकी, “आश्चर्य! मैं शादी होकर आई थी तब इसमें बहुत आम होते थे। लेकिन एक घटना के बाद पिछले 50 साल से यहां की जमीन बंजर हो गई।”
मीना, “ऐसी क्या घटना हो गई थी दादी कि आम के पेड़ सहित यहां पर जमीन बंजर हो गई?”
विमला काकी, “होशियार सिंह के बाप के पास तेरे दादा ने जमीन गिरवी रखी थी।
सूद समेत पैसा लौटाकर वापस ले लिए थे। यह गांव की सबसे ज्यादा उपजाऊ जमीन थी।”
मीना, “तो फिर जमीन यकायक बंजर कैसे हो गई?”
विमला काकी, “होशियार सिंह के बाप का कहना था कि पेड़ पर आम मेरे हैं, पेड़ में मंजरी मेरे समय की है।
और तेरे दादा का कहना था कि मैंने सूद समेत पैसा लौटा दिया तो आम मेरे हैं।”
मीना, “दादाजी तो ठीक ही बोल रहे थे।”
विमला काकी, “हां! दूसरे दिन सुबह-सुबह हमारा नौकर गधैया एक आम तोड़कर खा रहा था,
तभी होशियार सिंह के पिताजी ने उसे गोली मार दी और जेल चला गया। तब से यह खेत बंजर हो गया।”
मीना, “मां! हम लोग इस बार खूब आम खाएंगे।”
विमला काकी, “अरे बेटी! आम खाना भी और बेचना भी, इसमें बहुत आम होते हैं।”
तभी उधर से पंडित ज्ञानचंद आते हैं।
पंडित ज्ञानचंद, “अरे! इस पेड़ पर फिर से मंजरी आ गई? मैंने बचपन में इस पेड़ के आम खाए हैं, बहुत ही मीठे और स्वादिष्ट होते थे।”
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विमला काकी, “हां पंडित जी! इस पेड़ से मेरी बहुत सी यादें जुड़ी हैं। मीना का पापा और मेरा लल्ला गरीबी में गुजर गया,
लेकिन इसे बेचा नहीं।
पंडित ज्ञानचंद, “हां, वे कहा करते थे कि यह पेड़ नहीं मेरा गधैया है। चलो काकी, इस पर फल लगेंगे तो एक पूजा करवा देना।”
मीना, “मां! जल्दी-जल्दी चलो धूप निकल गई है। लकड़ियों को सुखाकर दोपहर में बाजार जाकर बेच आएंगे।”
मीना और सुमन दोनों लकड़ियों को सुखाकर बाजार में बेचकर पैसे लिए घर लौट रही थीं कि बिरजू चोर अचानक मीना के हाथ से पर्स पर झपट्टा मारकर भाग जाता है।
मीना, “चोर-चोर! पकड़ो! मेरा पर्स लेकर भाग रहा है… कोई पकड़ो उसे!”
सुमन, “जाने दे बेटा! शायद वो पैसा हमारे नसीब में नहीं था।”
मीना, “ऐसा कैसे नसीब में नहीं था? चार दिन से दादी भूखी हैं, वो भूखी मर जाएंगी।”
किसी तरह सुमन मीना को समझा बुझाकर घर ले जा रही थी। अचानक कूड़े में पड़े भोज के झूठे पत्तल में से मीना बचे हुए खाने को एक पॉलिथीन में भरने लगती है।
सुमन, “मीना! यह क्या कर रही हो? पागल हो गई हो क्या?”
मीना, “अगर दादी मां को आज खाना नहीं मिला तो वो मर जाएंगी।”
इस तरह विमला काकी के घर की हालत बद से बदतर हो जाती है। डेढ़ महीने में फल तैयार हो गए। उधर होशियार सिंह अपने आदमी बलुआ से कहता है।
होशियार सिंह, “जब-जब मैं इस पेड़ को देखता हूं पिताजी याद आ जाते हैं।
मेरे पिताजी को इसी पेड़ के कारण अंतिम दिनों में जेल जाना पड़ा था। मैं उनका मुंह भी नहीं देख सका था।”
बलुआ, “कोई बात नहीं मालिक! मैं आज रात ही सारे आम तोड़कर आपके गोदाम में पहुंचा दूंगा, आप टेंशन ना लें।”
होशियार सिंह, “मुझे तुमसे यही उम्मीद है।”
रात में बलुआ बिरजू चोर और खिरजू को लेकर भूतिया आम के पेड़ के पास पहुंचता है।
खिरजू, “ओ देख रहे हो बिरजू? सभी आमों को तोड़कर मालिक के गोदाम में पहुंचाना है हमें।”
बिरजू, “उस्ताद! मैंने ना जाने कितने गांव में जाकर आम के पेड़ों से आम चुराए होंगे, लेकिन इतने आम एक पेड़ में कहीं नहीं देखे।”
खजूर, “सही कह रहा है भाई! लगता है हर पत्ता फल में बदल गया।”
बलुआ, “ए चलो भाई! चलो सब काम पर लग जाओ।”
थोड़ी देर में बलुआ के मुंह पर एक आम आकर जोर से लगता है।
बिरजू, “अबे ओ खिरजू! देखकर फेंका कर, मुझे चोट लग गई!”
खिरजू, “उस्ताद! मैं तो आम दूसरी तरफ फेंक रहा हूं, यह जरूर बिलुआ की करतूत है।”
तभी दूसरा आम भी आकर बलुआ के चेहरे पर लगता है। वो बिलबिला उठता है। ्
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बलुआ, “ओ साले चोर कमीने! अबे मुझसे मजाक भारी पड़ेगा बता रहा हूं। उतर तुझे बताता हूं, तेरी ऐसी की तैसी!”
खिरजू, “उस्ताद! मैं तो अभी आम खा रहा हूं, मैं कैसे फेंक सकता हूं?”
तभी एक और बड़ा सा आम फिर से बलुआ की पीठ पर लगता है।
बलुआ, “कमीनो! अभी तुरंत पेड़ से उतरो! उतरो, मैं तुम्हें बताता हूं कि निशाना कैसे लगाया जाता है?”
एक-एक करके आम खिरजू और बिरजू दोनों को लगते हैं।
खिरजू, “कमीने बिरजू! अभी मैं बताता हूं तुझे, नीचे उतर!”
बिरजू, “अच्छा? मुझे मारकर मुझे ही धमकी दे रहा है तू? उतर, मैं तेरी बैंड बजाता हूं!”
नीचे उतरकर तीनों में लड़ाई होने लगती है।
खिरजू, “ओ कमीने बिरजू! तूने मेरी पेंट क्यों उतारी रे?”
बिरजू, “ना-ना भैया खिरजू! मैंने तुम्हारा पेंट नहीं खींचा।”
खिरजू, “अबे मेरा पेंट छोड़ दे कमीने! मैंने चड्डी भी नहीं पहनी आज… ओ छोड़ दे!”
तभी पेड़ से आम की मूसलाधार बारिश होने लगती है। तीनों का चेहरा लहू-लुहान हो जाता है। तभी वहां गधैया का भूत प्रकट होता है।
गधैया, “बहुत दिनों से किसी से पाला नहीं पड़ा, आज मजा आएगा। आज तुम्हारी मौत तुम्हें यहां ले आई है।”
बिरजू, “अबे भूत! भूत भाई! मुझे ये दोनों बहला-फुसला कर लेकर आ गए, मुझे छोड़ दो।”
गधैया, “छोड़ दूंगा? तुम्हें तो आम के अचार की तरह काटकर मिर्च मसाला लगाकर खाऊंगा!”
खिरजू, “देखा उस्ताद! मैं ना कह रहा था ये लौंडा भरोसे का नहीं है।”
बिरजू, “मर गया रे! उस्ताद बचाओ मेरा हाथ टूट गया।”
बलुआ, “कमीनो! मुझ पर तो लगता है फूल बरस रहे हैं।”
बलुआ, “देखो भूत भाई! हमारी आपसे कोई दुश्मनी नहीं है। हम तो नौकर ठहरे, मालिक के आदेश का पालन कर रहे हैं, हमें छोड़ दो।”
गधैया, “गलत का साथ दोगे तो गलत ही अंजाम भुगतोगे। और गधैया से पीछा छुड़ाना आसान नहीं है बच्चों!”
तीनों, “हमें माफ कर दो भैया! माफ कर दो! आज के बाद कोई भी बुरा काम नहीं करेंगे, तुम जैसा बोलोगे वैसा ही करेंगे।”
गधैया, “ठीक है, तो सारे आम गाड़ियों में भरकर विमला काकी के घर पहुंचा दो।”
बलुआ, “ठीक है भूत भाई! जान बची तो लाखों पाए भैया।”
रातों-रात सारे आम विमला काकी के घर पहुंच जाते हैं। उधर होशियार सिंह के घर पर भी आमों की बारिश होने लगती है।
होशियार सिंह, “अरे! छत पर से आम कैसे टपक रहे हैं? अरे मेरी नाक टूट गई! अरे! रोको इन आमों को… अरे बचाओ!”
गधैया, “क्यों? तुम्हें आम चाहिए ना? ले लो आम। तुम्हारे बाप को भी इसी पेड़ के आम चाहिए थे। क्यों? “
होशियार सिंह, “कौन हो तुम?”
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गधैया, “गधैया… नाम तो सुना ही होगा तूने?”
होशियार सिंह, “पर… पर तुम तो मर गए थे ना?”
गधैया, “याददाश्त तो तुम्हारी बहुत तेज है! तो यह भी याद होगा कि तुम्हारे बाप ने ही मेरी हत्या की थी।”
होशियार सिंह, “हां-हां याद है! उसके लिए उन्हें सजा भी हुई थी और उन्होंने जेल में ही दम तोड़ दिया था।
उनकी सजा उन्हें मिल गई। मैंने तो कुछ नहीं किया था ना… मुझे छोड़ दो!”
गधैया, “कुछ करने की सोचना भी नहीं! सारा आम तुम्हारे आदमियों ने विमला काकी के यहां पहुंचा दिया है। अगर कुछ उल्टा-पुल्टा किया तो याद रखना, मेरा नाम गधैया है।”
सुबह में मीना जैसे ही घर का दरवाजा खोलती है, खुशी से उछल जाती है।
मीना, “मां… दादी, जल्दी आओ। बाहर देखो किसी ने सारे आम हमारे घर पहुंचा दिए हैं।”
विमला काकी, “बहू! जल्दी से पंडित जी को बुलाकर आज पूजा करवा दो। मीना, तू व्यापारी मंगतलाल को बुला ला।”
पंडित ज्ञानचंद आकर पूजा करने लगते हैं। इधर होशियार सिंह के घर पर।
होशियार सिंह, “क्यों रे हरामखोरो? कल रात तो बड़ा उछल-उछल कर दंभ भर रहे थे! क्या हुआ? एक छोटी सी चोरी ना हो पाई… दूर हो जाओ मेरी नजर से!”
तभी वहां व्यापारी मंगत लाल आता है।
होशियार सिंह, “क्यों मंगत? सुना है तुम आम का सौदा करने जा रहे हो?”
मंगत लाल, “नहीं हुजूर! आपकी बिना इजाजत के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता इस गांव में। मैं अभी जाकर मना कर दे रहा हूं।”
होशियार सिंह, “हां! इसी में तुम्हारी भलाई है।”
इधर विमला काकी के घर पर।
पंडित ज्ञानचंद, “वाह! बहुत स्वादिष्ट खाना बनाया था काकी तुम्हारी बहू ने। अचार ने तो मन मोह लिया। अगर कुछ अचार बचा हो तो बांध देना।”
सुमन, “यह अचार मैंने इन्हीं आमों से बनाया है। अभी एक डब्बा अचार पोटली में बांध देती हूं।”
तभी मंगत लाल पहुँचता है।
मंगत लाल, “प्रणाम काकी! देखिए काकी, आप तो जानती ही हैं कि मैं एक व्यापारी आदमी हूं, घुमा-फिरा कर बात नहीं करता। मैं यह आम जो है वह नहीं ले सकता।”
पंडित ज्ञानचंद, “क्यों मंगत लाल? इतनी अच्छी नस्ल का आम पूरे बाजार में नहीं मिलेगा। मैंने अभी-अभी खाया है।”
मंगत लाल, “देखिए पंडित जी! आप ठहरे ब्राह्मण पंडित, शास्त्रों के ज्ञाता… पर मैं साधारण व्यक्ति हूं।
मैं यह भूतिया पेड़ का आम नहीं ले सकता भैया! कल को ऊंच-नीच हो गई तो मैं क्या करूंगा?”
मंगत लाल लाख समझाने पर भी सौदा नहीं करता और चला जाता है।
पंडित ज्ञानचंद, “दादी! यह आम तो 10-15 दिनों में यूं ही सड़ जाएगा।”
मीना, “मैंने कहा था ना, हमारा भाग्य ही खराब है। अब क्या होगा?”
पंडित ज्ञानचंद, “बेटी! तेरा भाग्य खराब नहीं, जिसने यह आम नहीं लिया उसका भाग्य खराब है।
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इन सब आमों का अचार बना दो, फिर यह महीनों तक रह जाएंगे। और मेरा दावा है इतना स्वादिष्ट अचार कहीं नहीं मिलेगा।”
मीना, सुमन और विमला काकी मिलकर सारे आमों का अचार बना देती हैं। ज्ञानचंद मसाले का इंतजाम कर देता है।
फिर अचार का सैंपल शहर ले जाकर एक व्यापारी को देता है और एक बड़ा व्यापारी सारा अचार खरीद लेता है। इधर होशियार सिंह डाकू के सरदार चंपत सिंह से बोलता है।
होशियार सिंह, “कल जो अचार शहर जा रहा है, उसे तुमको बीच रास्ते में ही लूट लेना है। इस काम के लिए ₹50,000 मिलेंगे।”
चंपत सिंह, “काम हो जाएगा होशियार सिंह! तुम पैसा तैयार रखो।”
रास्ते में डाकू गाड़ी रोक लेते हैं।
जगीरा, “ए पंडित! चल हट, तेरी सेवा समाप्त। अब यहां से मेरी सेवा शुरू!”
पंडित ज्ञानचंद, “देखो, यह गरीब की मेहनत और खून-पसीने से बना माल है। भगवान के लिए इसे छोड़ दो।”
जगीरा, “पंडित! तुम्हारे कानों में सीधा-सीधा आवाज नहीं जाती क्या? सरदार ने जो कह दिया वह पत्थर की लकीर समझ और यहां से कलटी मार ले।
गाड़ी वालों! तुम लोग इस अचार को हमारे अड्डे पर पहुंचाओगे, सभी समझ गए या लात मारकर समझाऊं?”
तभी जगीरा को पीठ पर जोरदार लात पड़ती है और वह औंधे मुंह गिर जाता है।
जगीरा, “किसने लात मारी रे? सामने आओ! अभी पूरी बंदूक की गोली खाली कर दूंगा तुझ पर।”
गधैया, “गधैया नाम है मेरा! नाम तो सुना ही होगा?”
तभी चंपत सिंह की पीठ पर भी एक जोरदार प्रहार होता है।
गधैया, “कमीनो! अगर अपनी खैर चाहते हो तो तुरंत यहां से भाग जाओ। नहीं तो बंदूक उठाने के लायक भी नहीं बचोगे।”
गधैया भूत पूरे गैंग की क्लास लेता है और सभी भाग जाते हैं। अचार सेठ के पास पहुँच जाता है। जल्द ही ‘मीना आम के अचार वाली’ पूरे देश में फेमस हो जाती है।
आज उसका अचार का ब्रांड है। उधर डाकू चंपत सिंह होशियार सिंह से 5 लाख रुपये हरजाना वसूलता है।
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