लालची किसान | LALCHI KISAAN | Moral Kahani | Hindi Story | Achhi Achhi Kahani | Moral Stories in Hindi

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हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” लालची किसान ” यह एक Moral Story है। अगर आपको Moral Stories, Hindi Stories या Hindi Moral Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।


गोरखपुर नाम के गांव में दो भाई रहते थे, बबलू और सतीश। दोनों भाई बहुत खुश रहा करते थे और दोनों भाइयों के खेत पास पास में ही थे।

इसलिए दोनों के खेतों में एक जैसी खेती होती थी और दोनों आलू की खेती किया करते थे।

बबलू, “अरे ओ सतीश! अब की बार तो हमारे आलू की खेती बहुत अच्छी हुई है।”

सतीश, “हाँ बबलू भाई, हुई तो है। लेकिन इतनी भी कुछ खास खेती नहीं हुई है।”

बबलू, “अरे यार! पिछली बार से तो बहुत अच्छी खेती हुई है।”

सतीश, “हां हां बस बस भाई। ये आपके लिए अच्छी खेती होगी, मेरे लिए नहीं है।”

बबलू, “बस कर अब और चल मेरे साथ बाजार में जाकर, आलू भी तो बेचने हैं।”

सतीश, “हाँ हाँ, चलो भैया।”

सेठ, “अरे बबलू और सतीश! आ गए तुम भी आलू लेकर…क्या बात है? इस बार तो लगता है कि तुम दोनो की आलू की खेती कुछ ज्यादा ही हुई है।”

बबलू, “हाँ सेठ जी, इस बार आलू की खेती बहुत ही अच्छी हुई है।”

सतीश, “अरे! कहाँ सेठ जी? इतनी भी कुछ खास खेती नहीं हुई है।”

बबलू, “अरे सेठ जी! आप ये आलू लो। ये तो कभी भी खुश नहीं होता है।”

सेठ, “ठीक है, ठीक है। मैं अभी तुम लोगों को आलू की कीमत देता हूँ। अरे चन्दू! जरा देख तो कितनी बोरियाँ लाए हैं ये दोनो?”

चन्दू, “जी मालिक, अभी देखता हूँ।”

चंदू आलुओं की बोरियों को गिनता है।

सेठ, “अरे चन्दू! देख ली ना? तूने बोरियाँ पूरी गिनी हैं न?”

बबलू, “सेठ जी, आप चिंता मत करो। हम कभी भी आपसे धोखा नहीं करेंगे।”

सेठ, “अरे बबलू! वो तो पता है मुझे। लेकिन मैं तो अपने मन की तसल्ली के लिए बस ये बोरियों की जांच करवा रहा हूँ।”

सतीश, “सेठ जी, कोई नहीं, आप अपना काम कीजिए।”

सेठ, “अरे चन्दू! कहाँ मर गया? बता बोरियाँ पूरी हैं न?”

चन्दू, “जी मालिक, बोरियाँ पूरी हैं।”

सेठ, “यह लो तुम दोनो के आलू की कीमत।”

बबलू को जो पैसे मिले, उनसे वो बहुत खुश हो जाता है। लेकिन सतीश के मन का लालच उसे खुश नहीं होने देता। वो बहुत दुखी हो जाता है।

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बबलू, “अरे सतीश! तू दुखी क्यों हो रहा है? यह तो हमारी मेहनत का फल है। देख, अबकी बार हमें इतने सारे पैसे मिले हैं।”

सतीश, “भैया, आप भले खुश हो गए। लेकिन मैं इन पैसों से खुश नहीं हूँ।”

ऐसा कहकर सतीश अपने घर के लिए निकल जाता है।

बबलू, “इसका लालच कभी खत्म नहीं होगा। किसी दिन इसका यही लालच इसे ले डूबेगा।”

ऐसा कहकर बबलू भी अपने घर चला जाता है।

सतीश, “दिन रात खेतों में काम करके मिलता क्या है? बस ये कुछ रूपए? इतने रुपए में मेरा क्या होगा? अगर ऐसे ही चलता रहा तो मैं घर कैसे चलाऊंगा?”

तभी सुमन सतीश के लिए पानी का गिलास लेकर आती है।

सुमन, “ये लीजिये पानी। आज आप इतने दुखी क्यों हैं? और ये अकेले में किस से बातें कर रहे हो?”

सतीश, “अभी मैं बाजार में आलू बेचकर आया हूँ और देखो सेठ लाला राम ने कितने पैसे दिए?

बताओ, मैं क्या इतने से पैसों के लिए दिन रात खेतों में काम करता हूँ? देखो कितने कम पैसे मिले हैं।

इससे मेरा क्या होगा और इससे मैं घर कैसे चलाऊंगा?”

सुमन, “तो क्या हुआ? आप चिंता मत करो, मैं इतने पैसों में गुजारा कर लूंगी। और वैसे भी हम किसानों को अनाज का इतना ही पैसा मिलता है।”

सतीश, “दूसरे किसानों को मिलते होंगे इतने पैसे क्यूंकि वो सब बस मेहनत करते हैं, दिमाग नहीं लगाते। इसलिए वो लोग खुश हैं इतने पैसों में।”

सुमन, “लेकिन सुनिए जी, हम लोग खुश तो हैं।”

सतीश, “नहीं, मैं इतने पैसों में खुश नहीं हूँ क्योंकि मैं इन लोगों से अलग हूँ। मैं खेती करके भी इन लोगों से ज्यादा पैसे कमाऊँगा।”

सुमन, “लेकिन सुनिए जी, हमें ज्यादा लालच नहीं करना चाहिए क्योंकि ज्यादा लालच करने से नुकसान ही होता है। लालच करना अच्छी बात नहीं है।”

सतीश, “तुम मुझे मत बताओ कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं? जा, अंदर जाकर खाना बना।”

सुमन दुखी होकर अंदर चली जाती है।

सतीश, “ऐसा मैं क्या करूँ जिससे मुझे ज्यादा पैसे मिले? क्या करूँ, क्या करूँ? हां, मुझे एक तरकीब सूझी है।”

अगले दिन बबलू और सतीश अपने अपने खेतों में खेती करते हैं।

बबलू, “अरे सतीश! तुझे आज क्या हुआ? कल तो तू बहुत दुखी था लेकिन आज तो तू बहुत ही खुश दिखाई दे रहा है।”

सतीश, “बबलू भाई, मैंने सोचा की हमें जितना मिला है, हमें उसमे ही खुश रहना चाहिए।”

बबलू, “लगता है तुझमें अकल आ गई है।”

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सतीश (मन में), “भैया, अब तुम्हे क्या पता की मुझे क्या तरकीब सोची है ज्यादा पैसे कमाने की?”

बबलू, “क्या हुआ तुझे? अब तू क्या सोचने लग गया?”

सतीश, “नहीं नहीं भैया, कुछ नहीं।”

बबलू, “चल अब जल्दी जल्दी खेती करके अपने अपने घर चलते हैं।”

ऐसे ही दिन बीत जाते हैं और आलू की फसल पक जाती है। सतीश और बबलू खेतों में से आलू निकाल कर बोरियों में भर लेते हैं।

बबलू, “सतीश, चल मंडी चलते हैं।”

सतीश, “नहीं भाई आप जाओ, मेरी आज तबियत कुछ ठीक नहीं है।”

बबलू, “चल ठीक है तू आराम कर, मैं मंडी जाकर अपने आलू बेच आता हूँ।”

सतीश (मन में), “मुझे तो बस अब रात होने का इंतज़ार करना है।”

रात को सतीश अपने खेत में जाता है और खेत से आलूओं को निकाल कर बोरी में भरता है।

और बोरी में आलुओं के साथ साथ पत्थर भी भरता है जिससे बोरियों की संख्या बढ़ जाती है।

सतीश, “अब आएगा मजा, अब होगा मेरा डबल मुनाफा।”

अगले दिन बबलू और सतीश आलूओं की बोरियों को रिक्शे में रख कर मंडी में बेचने के लिए जाते हैं।

सतीश, “सेठ जी, ये लीजिये आलू की बोरियां।”

सेठ लाला राम पहले बबलू की बोरियां देखता है फिर सतीश की बोरियों को देख कर हैरान हो जाता है।

सेठ, “अरे! क्या बात है सतीश, इतने सारे आलू की बोरियां कहाँ से ले आये?”

सतीश, “वो वो कुछ नहीं सेठ जी, बस इस बार मैंने कुछ ज्यादा ही मेहनत कर ली इसलिए आलू की इतनी अच्छी फसल हुई है।”

सेठ लाला राम, “अच्छा अच्छा ठीक है ठीक है। अरे चन्दू! जरा इन दोनो की बोरियों को गिनकर बता कितनी हैं?”

चन्दू, “जी मालिक, अभी गिनकर बताता हूँ।”

चन्दू दोनो की बोरियों को गिनता है और सेठ को आकर बता देता है।

सेठ लाला राम, “देखो भाई बबलू तेरी आलू की बोरियां हैं 10, इसके हिसाब से तेरे बने 5000 रूपए।

और भाई सतीश तेरी हैं 20 बोरियां तो तेरे हुए 10 हजार रूपए। लो भाई तुम दोनो पकड़ो अपने अपने पैसे।”

सेठ से आलुओं की बोरियों के इतने सारे पैसे मिलने पर सतीश बहुत खुश हो जाता है और दोनों पैसे लेकर खुशी खुशी अपने घर चले जाते हैं।

सतीश, “अरे सुमन! सुनती हो? कहाँ हो? देखो देखो, बाहर आओ देखो।”

सुमन, “आई जी, आई। क्या हुआ जी? क्यूँ अपने पूरे घर को सिर पर उठा रखा है?”

सतीश, “अरे देख, मैं आज कितने सारे पैसे लेकर आया हूँ?”

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सुमन, “आप इतने सारे पैसे कहाँ से लेकर आये हो? आप कोई गलत काम तो नहीं कर रहे?”

सतीश, “अरे! तू पागल है क्या? मैं कोई गलत काम नहीं कर रहा हूँ, बल्कि अपने दिमाग का इस्तेमाल कर रहा हूँ।”

सुमन, “मुझे डर लग रहा है।”

सतीश, “अरे! जा, तू जाकर अपना काम कर और मेरा दिमाग मत खा। मुझे आज खुश रहने दे।”

सुमन रोते हुए भगवान से प्रार्थना करती है।

सुमन, “हे भगवान, यह जो भी गलत काम कर रहे हैं, इनको उस गलत काम को करने से रोकिये।”

सतीश की तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहता था।

सतीश, “अब आया ना मजा।”

अगले दिन सतीश खेतों में काम करने जाने के लिए घर से निकल ही रहा होता है कि तभी वो देखता है

कि सेठ लाला राम गुस्से में अपने पहलवान नौकरों को भी साथ में लेकर आ रहा है और उनके हाथों में डंडे भी हैं।

सतीश (मन में), “अरे अरे! ये ये सब मेरे घर क्यों आ रहे हैं? कहीं सेठ को पता तो नहीं लग गया कि मैंने सेठ के साथ धोखा किया है?”

सेठ लाला राम सतीश से आकर गुस्से में बोलता है।

सेठ लाला राम, “तो तूने क्या मुझे बेवकूफ समझा हुआ है?”

सतीश, “सेठ जी, क्या हुआ? इतने गुस्से में क्यों हैं? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

सेठ लाला राम, “अच्छा! तुझे कुछ भी याद नहीं है कि तूने क्या किया है? तू क्या समझता है कि मैं बेवकूफ हूँ जो तेरी चालाकी को नहीं पकड़ पाऊंगा?”

तभी सुमन भी घर से बाहर आ जाती है और सेठ को गुस्से में देख कर डर जाती है।

सुमन, “सेठ जी, क्या हुआ है? आप इतना गुस्सा क्यों हो रहे हैं?”

सेठ लाला राम, “तुझे नहीं पता तेरे पति ने क्या किया है?”

सुमन, “नहीं सेठ जी, मुझे कुछ नहीं पता। क्या किया इन्होंने?”

सेठ लाला राम, “तुझे क्या लगता है? सतीश के आलुओं की बोरियों में आलुओं के साथ पत्थर रख देगा तो मुझे पता नहीं चलेगा क्या?

तुम मूर्ख हो। इसे मिलावट करने की सजा तो देनी होगी। मारो इसे!”

सतीश, “अरे! नहीं, नहीं मुझे छोड़ दो! मुझे मत मारो! मैं पैसे वापस लौटा दूंगा और आज के बाद किसी के साथ कोई धोखा नहीं करूंगा। छोड़ दो मुझे सेठ जी।”

सुमन, “नहीं नहीं सेठ जी, छोड़ दीजिये इन्हें। आज के बाद ऐसा कोई काम नहीं करेंगे।”

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सेठ लाला राम, “ठीक है, ठीक है, मैं इसे छोड़ देता हूँ। और हाँ, आज के बाद तुमने अगर किसी के साथ भी कोई धोखा किया तो तुझे अब की बार थाने में बंद करवा दूंगा।”

ऐसा कहकर सेठ वहाँ से चला जाता है।

सुमन, “मैंने आपसे कहा था न, लालच का फल हमेशा कड़वा होता है। लेकिन आपने मेरी कोई बात नहीं मानी। अब देखिये न हमारे साथ ये क्या हुआ?”

सतीश, “नहीं नहीं, आज के बाद मैं कभी कोई लालच नहीं करूँगा।”


दोस्तो ये Moral Story आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!


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