हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” रहस्यमय बांसुरीवाला ” यह एक Hindi Story है। अगर आपको Hindi Stories, Hindi Kahani या Achhi Achhi Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।
एक गांव में रतन नाम का लड़का अपने भैया बिरजू और भाभी आरती के साथ रहता था।
रतन आराम से अपने कमरे में लेटा था कि तभी बिरजू उसके पास आकर बोला।
बिरजू, “ऐसा कब तक चलता रहेगा, रतन? तुम कोई काम धंधा करोगे या नहीं? या ऐसे ही दिन भर आवारागर्दी करते रहोगे?”
रतन, “भैया! आप तो हमेशा मेरे पीछे ही पड़े रहते हैं।”
बिरजू, “तुम्हारी चिंता होती है भाई, इसलिए तुम्हें बोलता रहता हूं।”
रतन, “आज अगर माता-पिता होते तो क्या वह भी मुझसे ऐसी बात करते?”
बिरजू, “विश्वास करो भाई! अगर आज माता-पिता जिंदा होते तो उन्हें तुम्हें देखकर बहुत दुख होता।
रतन, मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूं, मुझे गलत मत समझो। कल को मुझे तुम्हारा ब्याह भी करना है।
चार पैसे अगर घर में कमाकर लेकर आओगे तो बाहर के लोग तुम्हारी ही तारीफ करेंगे।”
इतना बोलकर बिरजू कमरे से बाहर निकल गया। बिरजू की पत्नी आरती बिरजू से बोली।
आरती, “आपको रतन से इस तरह से बात नहीं करनी चाहिए। अब वो जवान हो गया है।”
बिरजू, “तुम तो जानती हो आरती! माता-पिता के गुजर जाने के बाद मैंने ही रतन को पाल-पोस कर बड़ा किया है। मुझे उसकी चिंता होती है।”
आरती, “और जैसे मुझे तो उसकी कोई चिंता ही नहीं होती! मत भूलो मैं रतन की भाभी हूं और भाभी मां समान होती है।”
बिरजू, “तो फिर तुम ही उसे कुछ काम-धंधा करने को क्यों नहीं कहती? मेरी बात तो वह मानेगा नहीं, हो सकता है तुम्हारी बात मान जाए।”
इधर रतन का अपने बड़े भाई की बात सुनकर मूड खराब हो चुका था। वह गुस्से से उठकर बाहर की तरफ जाने लगा तभी बिरजू बोला।
बिरजू, “अरे! कहां जा रहे हो?”
रतन, “कहीं नहीं भैया! थोड़ी देर बाद वापस आ जाऊंगा।”
आरती, “अरे! नाश्ता तो करते जाओ, रतन।”
रतन, “मुझे भूख नहीं है भाभी, बाहर जाकर खा लूंगा।”
इतना बोलकर रतन बाहर चला गया। बिरजू अपनी पत्नी से बोला।
बिरजू, “देखा! यह सब तुम्हारे लाड़-प्यार का नतीजा है। आरती, मुझे इस लड़के के लक्षण बिल्कुल भी सही नजर नहीं आ रहे।”
आरती, “तुम तो बस उसके हमेशा पीछे ही पड़े रहते हो। अब उसे काम-धंधे के लिए बोलने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं है। मैं उसे प्यार से समझा दूंगी।”
इधर रतन गुस्से से घर से बाहर निकला ही था कि तभी गांव का मुखिया रास्ते में उसे मिल गया।
मुखिया, “अरे रतन! सुबह-सुबह इतने गुस्से में कहां जा रहे हो भाई?”
रतन, “मुखिया जी! भैया जब देखो मेरे पीछे पड़े रहते हैं। हमेशा बोलते रहते हैं कि कोई काम-धंधा करो।”
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मुखिया, “वो कुछ गलत तो नहीं बोलता, बेटा। मत भूलो तुम्हारे बड़े भैया के तुम पर बहुत उपकार हैं। माता-पिता के गुजरने के बाद उसने तुम्हें अपनी संतान की तरह पाला है।”
रतन, “लेकिन मुखिया जी! मैं कोई बड़ा काम करना चाहता हूं, छोटा-मोटा काम नहीं करना चाहता।”
मुखिया, “बिरजू इसी बात से डरता है रतन कि तुम बड़े काम के चक्कर में कोई उल्टा-सीधा काम ना करने लगो।
रतन, जीवन में कभी कोई ऐसा काम मत करना जिससे तुम्हारे बड़े भाई का सर नीचा हो।
तुम्हारे बड़े भैया का इस गांव में बहुत सम्मान है। और रतन, काम छोटा हो या बड़ा काम काम होता हैभाई।”
अगले दिन रतन अपनी भाभी से बोला।
रतन, “भाभी! मुझे माफ कर दीजिए। कल मुझे भैया की बात पर बेवजह गुस्सा आ गया था।”
आरती, “अरे! तुम्हारे भैया तुम्हें बहुत चाहते हैं रतन। वो तुम्हारी बहुत चिंता करते हैं।
तुम्हें उनकी डांट का बुरा नहीं मानना चाहिए, बड़ों की डांट छोटों के लिए शिक्षा समान होती है।”
रतन, “भाभी! मैं आज काम-धंधे की तलाश में जा रहा हूं।”
आरती, “तुम क्या काम करने जा रहे हो, रतन?”
रतन, “बाजार में कोई ना कोई दुकान तलाश लूंगा भाभी… मिठाई वाले की या किसी लोहार की।
मैं अब मेहनत करने में पीछे नहीं हटूंगा और शाम को कुछ कमा कर ही लाऊंगा।”
इतना बोलकर रतन घर से बाहर निकल गया और बाजार में एक मिठाई वाले से बोला।
रतन, “मुझे काम चाहिए। क्या आपकी दुकान पर कोई काम मिल सकता है मुझे?”
मिठाई वाला, “अरे! तुम तो बिरजू के छोटे भाई रतन हो। जहां तक मैं जानता हूं तो मैंने सुना है
कि तुम कोई काम-धंधा नहीं करते और तुम्हारा बड़ा भाई तुमसे बड़ा परेशान रहता है।”
रतन, “देखिए! अगर आपके पास कोई काम-धंधा हो तो मुझे बता दीजिए, मुझे लेक्चर मत दीजिए।”
मिठाई वाला, “अरे! माफ करना रतन! तुम मेरी बात का बुरा मान गए। अभी मेरी दुकान पर कोई काम नहीं है, जब होगा तो मैं तुम्हें बुला लूंगा।”
रतन वहां से चला गया और सीधा एक लोहार की दुकान पर जाकर बोला।
रतन, “क्या यहां पर मुझे कोई काम मिल सकता है?”
लोहार रतन की ओर बहुत गौर से देखता हुआ बोला,
लोहार, “अरे! तुम तो बिरजू के छोटे भाई रतनवा हो ना?”
रतन, “हां! मैं बिरजू का छोटा भाई रतन हूं।”
लोहार, “अरे भैया! लोहार का काम कितनी मेहनत का होता है तुम्हें पता है?
और मैंने तुम्हारे बारे में सुना है भैया… कि तुम कोई काम-धंधा नहीं ना करते हो। देखो रतनवा, यह मेहनत का काम तुमसे नहीं होगा।”
लोहार की बात सुनकर रतन क्रोधित होकर तालाब के किनारे बैठकर अपने आप से बोला।
रतन, “समझ में नहीं आता गांव वालों को आखिर हो क्या गया है! अरे! पहले काम नहीं करता था
लेकिन अब तो काम करना चाहता हूं, लेकिन अब कोई मुझे काम ही नहीं दे रहा है।”
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रतन ने इतना कहा ही जा कि तभी उसके कानों में एक बांसुरी की सुरीली आवाज टकराई।
रतन, “यह बांसुरी कौन बजा रहा है? इसकी धुन तो बहुत ही ज्यादा अच्छी है, मन को मोह रही है।”
रतन इधर उधर देखने लगा। तभी उसकी नजर तालाब के पेड़ के नीचे बैठे हुए एक साधू पर पड़ी। रतन उस साधु के पास चला गया।
रतन, “कौन हैं आप? और आपकी यह बांसुरी तो बड़ी सुंदर है।”
रतन की आवाज सुनकर साधु ने बांसुरी बजाना बंद कर दिया और अपनी आंखें खोलकर रतन को गौर से देखता हुआ बोला
साधु, “तुम कौन हो?”
रतन, “मेरा नाम रतन है।”
साधु, “क्या तुम्हें बांसुरी पसंद है?”
रतन, “जब मैं छोटा था तब मुझे बांसुरी बजाने का बहुत शौक था। मैं मेले में अक्सर अपने पिता से बांसुरी लेने की जिद पर अड़ जाता था”
साधु, “जो बांसुरी की कदर करते हैं, वही बांसुरी की धुन पर खींचे चले आते हैं। वैसे तुम काम क्या करते हो?”
रतन, “अभी तो मैं कुछ नहीं करता लेकिन काम की तलाश में हूं।”
साधु, “क्या तुम बांसुरी बजा सकते हो, रतन?”
रतन, “हां-हां, क्यों नहीं? मैं बहुत अच्छी बांसुरी बजाता हूं।”
रतन बांसुरी बजाने लगा।
साधु, “तुम वाकई बांसुरी बहुत अच्छी बजाते हो। तुम बांसुरी बजाने का काम क्यों नहीं करते?”
रतन, “कैसी बातें कर रहे हैं बाबा? बांसुरी बजाने से क्या धन कमाया जा सकता है?”
साधु, “तुम्हारे हाथ में जो बांसुरी है, वह कोई मामूली बांसुरी नहीं है बल्कि एक जादुई बांसुरी है।
आज से तुम इसी तालाब के किनारे बैठकर बांसुरी बजाना और इस बांसुरी का कमाल देखना।”
इतना बोलकर वो साधु बड़ी तेजी से वहां से चला गया।
रतन, “अजीब साधु था। तालाब के किनारे बांसुरी बजाने से ऐसा कौन सा चमत्कार हो सकता है? लेकिन एक बार मुझे बांसुरी बजाकर देखनी चाहिए।
मैंने भाभी से वादा किया है कि मैं आज कुछ ना कुछ कमा कर घर पर लाऊंगा। अगर खाली हाथ गया तो भी भाभी मुझे गलत समझेगी।”
इतना बोलकर रतन तालाब के किनारे बैठकर बांसुरी बजाने लगा। रतन अपनी ही बांसुरी की धुन में इस कदर खो गया
कि उसे पता ही नहीं चला कि उसके पीछे कब एक बेहद सुंदर युवती जो कि आभूषणों से लेस थी, उसके पीछे आकर खड़ी हो गई?
युवती, “तुम वाकई बहुत अच्छी बांसुरी बजाते हो।”
रतन ने जैसे ही पलट कर देखा तो वह सुंदर युवती को देखकर हक्का बक्का रह गया
रतन, “तुम कौन हो?”
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रतन की बात का उस स्त्री ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपने सारे सोने के आभूषण उतार कर रतन को दे दिए और चुपचाप वहां से चली गई। रतन खुशी-खुशी घर चला गया।
आरती, “रतन! तुम्हारे हाथ में इतने ढेर सारे सोने के आभूषण कहां से आए?”
रतन, “भाभी! यह सब मेरे हैं और मैं ये सब कमा कर लाया हूं।”
आरती, “ऐसा कौन सा काम कर रहे हो तुम कि एक ही दिन में इतने सारे आभूषण खरीदकर ले आए? कहीं तुम कोई गलत काम तो नहीं कर रहे?”
रतन, “नहीं भाभी! यह सब मेरी इस बांसुरी की धुन का कमाल है।”
इतना बोलकर रतन सारी घटना अपनी भाभी को बताने लगा
आरती, “मुझे कुछ सही नहीं लग रहा, रतन। यह बांसुरी तुम उसी साधु को वापस करके आओ। मुझे तो यह कोई और ही चक्कर लगता है।”
रतन, “नहीं भाभी! मुझे वैसे भी अमीर बनना था और इससे अच्छा साधन अमीर बनने का मुझे और कहीं नहीं मिलेगा।”
इतना बोलकर रतन अपने कमरे के अंदर चला गया। कुछ देर बाद बिरजू रतन के पास आया।
बिरजू, “रतन! यह मैं क्या सुन रहा हूं? तुम्हारी भाभी जो कह रही है वह सब सच है?”
रतन, “हां भैया! वो सब सच है। अब से आपको काम करने की कोई जरूरत नहीं है।
मैं कुछ दिनों में इतना धन कमाकर एकत्रित कर दूंगा कि हम इस गांव में सबसे ज्यादा धनवान हो जाएंगे।”
बिरजू, “रतन! तुम्हें क्या हो गया है? मुझे तो लगता है कि उस साधु ने तुम्हारे ऊपर कोई जादू कर दिया है। तुम्हें यह सब कुछ गलत सा नहीं लग रहा?”
रतन, “नहीं भैया, मुझे कुछ गलत नहीं लग रहा।”
बिरजू गुस्से से पैर पटकता हुआ वहां से चला गया। अगले दिन जब रतन सोकर उठा तो उसे सोने के आभूषण गायब मिले”
रतन गुस्से से अपने भाई के कमरे में जाकर उससे बोला
रतन, “भैया! कल जो मैं सोने के आभूषण लेकर आया था वह कहां गए?”
बिरजू, “मुझे क्या पता वह कहां गए।”
बिरजू की बात सुनकर रतन गुस्से से आग बबूला हो गया।
रतन, “भैया! यह क्यों नहीं कहते कि जब मैं कल वो सोने के आभूषण लाया था तो आप मुझे देखकर जल-भुन गए थे?”
आरती, “यह क्या कह रहे हो रतन! तुम्हें अपने भैया से ऐसे बात करते हुए शर्म नहीं आती?”
रतन, “मैं बिल्कुल सही कह रहा हूं भाभी! भैया को मेरी कामयाबी बर्दाश्त नहीं हुई और इसीलिए उन्होंने गहने चोरी कर लिए।”
लेकिन कोई बात नहीं मेरे पास यह बांसुरी है। रतन दोबारा उसी तालाब के किनारे जाकर बैठकर बांसुरी बजाने लगा।
कुछ देर बाद उसकी आंख खुली तो उसके सामने एक सुंदर औरत जो कि आभूषणों से लैस बैठी थी, उसे निहार रही थी।
रतन, “कौन हो तुम?”
उस सुंदर औरत ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि अपने सारे आभूषण उतार कर रतन को देकर चली गई।
रतन, “यह बांसुरी तो वाकई चमत्कारी निकली। अब मैं यह सारा सोना घर नहीं ले जाऊंगा बल्कि पहले मैं इसे बाजार में बेच दूंगा।”
रतन आभूषणों को लेकर सुनार की दुकान पर चला गया और सारे आभूषण सुनार की दुकान पर रख दिए।
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सुनार, “अरे भैया! इतने ढेर सारे सोने के आभूषण? क्या कहीं से चोरी करके लाए हो क्या?”
रतन, “चोरी करके नहीं लाया बल्कि कमा कर लाया हूं। इसे खरीदोगे कि नहीं खरीदोगे?”
सुनार, “खरीदूंगा लेकिन आधी कीमत पर।”
रतन, “यह कैसी बातें कर रहे हो? आधी कीमत पर क्यों?”
सुनार, “क्या तुम्हारे पास इसकी पक्की रसीद है?”
रतन, “वह तो मेरे पास नहीं है।”
सुनार, “तब तो मैं आधी कीमत पर ही खरीदूंगा बेचना है तो बेचो नहीं, तो किसी और दुकान का रास्ता नापो।”
रतन अपने आप से बोला, “आधी कीमत पर बेचना भी बुरा नहीं है। कल और जाकर कमा कर ले आऊंगा।”
रतन, “ठीक है, मुझे इसकी आधी कीमत ही दे दो।”
सुनार ने रतन को सोने के आभूषणों की आधी कीमत दे दी। रतन पैसे लेकर अपने घर आ गया।
उसके हाथ में इतने ढेर सारे पैसे देखकर उसका बड़ा भाई बिरजू बोला।
बिरजू, “रतन, यह इतने ढेर सारे पैसे तुम कहां से लेकर आए?”
बिरजू की बात सुनकर ना जाने क्यों रतन को बुरी तरह से क्रोध आ गया?
रतन, “आपको इससे क्या मतलब है भैया? आप ही कहते थे ना कि कुछ काम कर लो कुछ काम कर लो।
अब जब मैं ढेर सारे पैसे कमा रहा हूं तो मुझसे इतने सारे सवाल क्यों पूछ रहे हो?”
बिरजू, “इतने सारे पैसे कमाने में एक साल बीत जाता है। एक दिन में इतने सारे पैसे या तो केवल एक बहुत बड़ा बिजनेसमैन कमा सकता है या फिर कोई बहुत बड़ा चोर।”
रतन, “सीधे-सीधे क्यों नहीं कहते भैया कि आप मुझसे अब जलने लगे हो? लेकिन चिंता मत करो।
कुछ दिनों बाद मैं इस मकान को छोड़कर चला जाऊंगा और अपने लिए एक आलीशान कोठी बनवाऊंगा। तब मेरी कोठी को देखकर आराम से जलते रहना।”
इतना बोलकर रतन अपने कमरे में चला गया। मगर अगली सुबह जब सोकर उठा तो उसके कमरे से पैसे गायब थे। रतन क्रोधित होकर फिर बिरजू के कमरे में आकर बोला।
रतन, “भैया, अब पानी सर से ऊपर उठ गया है। कल मेरे सोने के गहने आपने चुरा लिए और आज मेरे पैसे आपने चुरा लिए।”
बिरजू, “तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, रतन। मैं एक मेहनती आदमी हूं मुझे तुम्हारी हराम की कमाई से कोई लेना देना नहीं।”
तभी कुछ पुलिस वाले बिरजू के घर के अंदर घुस आए। एक पुलिस वाला रतन की ओर देखकर बोला।
पुलिस वाला, “हां भाई, क्या तुम ही बांसुरी बजाते हो?”
रतन, “हां, मैं ही बांसुरी बजाता हूं।”
पुलिस वाला, “कहां है तुम्हारी बांसुरी?”
रतन, “अ… आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं?”
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पुलिस वाला, “जो पूछा है उसका जवाब दो।”
रतन भागकर अपने कमरे से बांसुरी ले आया। पुलिस वाला बांसुरी को देखकर दूसरे पुलिस वालों से बोला।
पुलिस वाला, “गिरफ्तार कर लो इसे।”
रतन, “मैंने क्या किया है?”
पुलिस वाला, “अभी बताता हूं तूने क्या किया है?”
तभी वहां पर वही सुनार दो युवतियों के साथ अंदर आ गया जिन्होंने गहने रतन को दिए थे। पुलिस वाला रतन से बोला।
पुलिस वाला, “इन दोनों को तो तुम पहचानते ही होगे?”
रतन, “हां, मैं इन दोनों को पहचानता हूं। इन्होंने मेरी बांसुरी की धुन से खुश होकर अपने सोने के गहने मुझे भेंट स्वरूप दिए थे।
इनमें से एक के गहने तो चोरी हो गए और दूसरे गहने मैं सुनार को बेच आया था और वह पैसे भी अभी मेरे घर से चोरी हो गए।”
पुलिस वाला, “हम सबको मूर्ख समझा है क्या तूने? अपनी जादुई बांसुरी की धुन से लोगों को हिप्नोटाइज करके उनसे गहने छीन लेता है और फिर उल्टी सीधी बातें बताता है।”
पुलिस वाले की बात सुनकर रतन बुरी तरह से घबराते हुए बोला।
रतन, “मेरी बात का विश्वास कीजिए। इन दोनों ने मुझे गहने स्वयं दिए थे।”
तभी एक युवती पुलिस वाले से बोली।
युवती, “यह झूठ बोलता है सर मैं विवाह के मंडप में बैठी हुई थी अचानक से इसकी बांसुरी की धुन मेरे कानों में टकराई।
मुझे पता नहीं क्या हुआ मेरे पैर उस तालाब के किनारे चले गए। जब मुझे होश आया तो मेरे सोने के आभूषण मेरे तन से गायब थे। अगर मुझे कुछ याद था तो सिर्फ इसका चेहरा।”
उस दूसरी औरत ने भी पुलिस वाले को यही बताया।
पुलिस वाला, “तुम्हें तो उम्र कैद की सजा होगी।”
रतन फूट-फूट कर रोने लगा। रतन का रोना उसके बड़े भाई से ना देखा गया।
बिरजू, “सर, मेरा भाई सच बोल रहा है। यह बहुत भोला है। मुझे विश्वास है मेरे भाई ने कुछ गलत नहीं किया बल्कि इसके साथ स्वयं कुछ गलत हुआ है।”
तभी गांव का मुखिया कुछ लोगों के साथ एक साधु को पकड़कर वहां पर ले आया और बोला।
मुखिया, “गिरफ्तार करना है तो इस साधु को करिए सर। सारी की सारी करतूत इसी की है।
कल जब बिरजू ने घटना मुझे बताई थी मैं तभी से बिरजू के घर पर नजर रखे हुए था।”
इतना बोलकर मुखिया बिरजू से बोला।
मुखिया, “तुम कह रहे थे ना कि सोने के गहने आखिर चोरी कैसे हो गए? मैंने इसे स्वयं सोने के गहने चोरी करते हुए देखा था
और तो और आज सुबह भी मैंने इसे तुम्हारे घर से निकलते हुए देखा था।”
पुलिस वाला साधु से बोला।
पुलिस वाला, “क्या मुखिया जी सच बोल रहे हैं?”
साधु, “मुझे माफ कर दो इंस्पेक्टर साहब। ये सच बोल रहे हैं। मैं कोई साधु नहीं हूं। यह बांसुरी मैंने एक साधु से चुराई थी।
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मुझे इसका राज पता था। इसकी धुन सुनकर हर वह स्त्री सम्मोहित हो जाती है जो सोने के आभूषण पहने हुए होती है।”
पुलिस वाला, “समझ गया। इसका मतलब दूसरे गांव में जिन औरतों के आभूषण गायब हुए थे, उनमें भी तुम्हारा ही हाथ था है ना?”
साधु, “हां, उनमें भी मेरा ही हाथ था। जब मैंने रतन को पहली बार देखा तो मैं समझ गया कि वह बहुत भोला है। मैंने इसके भोलेपन का फायदा उठाया।”
पुलिस वाले ने उस साधु को गिरफ्तार कर लिया और रतन को छोड़ दिया।
बिरजू रतन से बोला।
बिरजू, “अब तुम्हारा क्या इरादा है?”
रतन, “मुझे माफ कर दो, भैया। अब मैं आपके साथ ही मेहनत करूंगा कभी भी लालच नहीं करूंगा।”
बिरजू, “इस बांसुरी का क्या करोगे?”
रतन, “मैं इस बांसुरी को तालाब में फेंक आऊंगा ताकि यह बांसुरी किसी और को ना मिले।”
रतन उसी दिन उस बांसुरी को तालाब में फेंक आया और मेहनत से अपने भाई के साथ मिलकर काम करने लगा।
दोस्तो ये Hindi Story आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!

