हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” रहस्यमय मूर्तिकार ” यह एक Rahasyamay Kahani है। अगर आपको Hindi Stories, Hindi Kahani या Achhi Achhi Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।
बहुत समय पहले की बात है। एक गांव में रतन नाम का एक बेहद गरीब किसान अपनी पत्नी झुमरी और अपनी 15 साल की पुत्री साक्षी के साथ रहता था।
एक दिन झुमरी रतन से बोलती है, “आखिर ऐसे कब तक चलता रहेगा, जी?
हमारी बिटिया 15 साल की हो गई है। कुछ समय बाद उसके हाथ पीले करने का समय आ जाएगा।”
रतन, “मैं तुम्हारी बात समझता हूँ, झुमरी। तुम चिंता मत करो। मैं आज से खेत में दिन-रात काम करूँगा।”
झुमरी, “तुम्हारी मेहनत करने से क्या फायदा? तुम्हारी सारी फसल तो जमींदार ले लेता है।
इतनी मेहनत करने के बावजूद हम सबको दो वक्त का पेट भर भोजन भी नसीब नहीं होता। काश! हमारा कोई पुत्र होता तो हमारे बुढ़ापे का सहारा बनता।”
रतन, “ईश्वर पर भरोसा रखो, सब कुछ ठीक हो जाएगा।”
इतना बोलकर रतन अपने खेत पर चला गया और मेहनत से हल चलाने लगा।
रतन को हल चलाते हुए कुछ ही समय हुआ था कि तभी गांव का जमींदार आ धमका।
जमींदार, “अब तुम्हें खेत में मेहनत करने की कोई जरूरत नहीं है, रतन।”
रतन, “मैं आपकी बात का मतलब नहीं समझा, जमींदार साहब। अगर मैं मेहनत नहीं करूँगा तो अपने परिवार का पेट कैसे पालूँगा?”
जमींदार, “मैं तुम्हें मेहनत करने से नहीं रोक रहा। तुम्हें मेहनत करनी है तो जाओ जाकर दूसरे के खेत में मेहनत करो, मेरे खेत में नहीं।”
रतन, “ये क्या कह रहे हैं आप? मैं अपने खेत में तो काम कर रहा हूँ। ये मेरा ही खेत है।”
जमींदार, “ये अब तुम्हारा खेत नहीं। ये तुम्हारा खेत था, अब ये मेरा खेत है। तुम्हारी याददाश्त शायद कमजोर हो गई है, रतन।
कुछ समय पहले तुमने मुझसे कर्ज लिया था जो तुम अभी तक चुका नहीं पाए हो।”
रतन, “झूठ मत बोलिए, जमींदार साहब। हर साल मेरी लगभग सारी फसल तो आप ले जाते हैं, लेकिन आपका जो कर्ज है, वो चुकने का नाम ही नहीं ले रहा।”
जमींदार, “वाह! लेते हुए तो बड़े मुस्कुरा रहे थे और देते समय आँखें दिखा रहे हो। अब तक मैं जो भी फसल ले गया हूँ, वह सब ब्याज थी।
जब तक तुम मेरी असल नहीं चुका देते, तुम अपने खेत में काम नहीं कर सकते। अब तुम यहाँ से जा सकते हो।”
रतन, “किसी माई के लाल में अगर हिम्मत है तो मेरे खेत से मुझे निकाल कर दिखाए, सारी दादागिरी खत्म कर दूँगा उसकी।”
जमींदार, “अच्छा… क्या कर लोगे तुम? अपनी पुत्री को लड़ने के लिए बुलाओगे? क्योंकि तुम्हारा कोई पुत्र तो है नहीं जो तुम्हारे लिए हमसे लड़ने आएगा।”
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तभी जमींदार के बगल में खड़ा उसका साथी संपत रतन से बोला।
संपत, “यहाँ से चले जाओ, रतन। तुम्हें आखिरी चेतावनी दे रहा हूँ। मुझे तुम पर हाथ उठाते हुए अच्छा नहीं लगेगा।
लेकिन अगर तुम ज़िद करोगे तो मजबूरन मुझे वो तरीका अपनाना पड़ेगा, जो तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा।”
रतन, “जाता हूँ, लेकिन मैं चुप नहीं रहूँगा। मैं इसकी शिकायत महाराज से जरूर करूँगा।”
इतना बोलकर रतन आँखों में आँसू लिए वहाँ से चला गया। दोपहर के समय, घर पर अचानक रतन को देखकर उसकी बीवी चौंक पड़ी।
झुमरी, “क्या हुआ, जी? आज आप समय से पहले खेत से घर वापस कैसे आ गए और आपकी आँखों में आँसू क्यों हैं?”
रतन, “उस नामुराद जमींदार ने हमारा खेत भी हमसे छीन लिया। झुमरी, मेरे तो हाथ कट गए। अब मैं क्या करूँगा?
उसने मुझसे मेरे ही खेत से अपमानित करके बाहर निकाल दिया और मैं कुछ नहीं कर पाया।”
इतना कहकर रतन रोने लगा। तभी उसकी पुत्री साक्षी वहाँ आ गई।
साक्षी, “पिताजी, आप रोइए मत, पिताजी। मैं जानती हूँ आप सिर्फ मेरी वजह से चिंतित हैं। ये सब मेरी वजह से हो रहा है।”
झुमरी, “ये तुम कैसी बातें कर रही हो, बेटी?”
साक्षी, “सही कह रही हूँ, माँ। आप दोनों को हमेशा मेरी शादी की चिंता खाई जाती है।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अगर मैं पैदा ही न होती तो शायद आप दोनों इतना दुखी न होते।”
झुमरी, “ऐसा मत कहो, बेटी। तुम तो हमारे लिए हमारी जान हो।”
साक्षी, “अगर मेरा कोई भाई होता तो उस जमींदार की इतनी हिम्मत नहीं होती कि मेरे पिता को अपमानित करके उनके ही खेत से बाहर निकाल देता।”
इतना बोलकर साक्षी रोती हुई दूसरे कमरे में चली गई। रतन रात भर गहरी सोच में डूबा रहा। अगले दिन रतन गांव के मुखिया के पास गया।
मुखिया, “क्या बात है रतन, आज सुबह-सुबह मेरे घर? सब कुछ ठीक तो है?”
रतन, “आप तो जानते हैं मुखिया जी कि मैंने कुछ समय पहले जमींदार से कुछ धन कर्ज में लिया था।”
मुखिया, “हाँ-हाँ, तुम्हारे बारे में सब जानता हूँ। तुमसे मैंने मना भी किया था कि उससे कर्ज मत लो।
रतन, जमींदार से सिर्फ तुम ही नहीं बल्कि हर व्यक्ति परेशान है जिसने उससे कर्जा ले रखा है।”
रतन, “मैंने सुना है मुखिया जी कि आपका राजमहल में आना-जाना लगा रहता है। क्या आप मुझे अपने साथ राजमहल लेकर जा सकते हैं?”
मुखिया, “तुम राजमहल जाकर क्या करोगे, रतन? आखिर तुम क्या सोच रहे हो?”
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रतन, “मैं जमींदार की शिकायत महाराज से करूँगा। उन्हें बताऊँगा कि किस तरह से जमींदार ने मेरे साथ बेईमानी करके मेरे ही खेत से मुझे निकाल दिया है।”
मुखिया, “रतन, मुझे तुमसे पूरी हमदर्दी है। पर तुम राजमहल जाना चाहते हो तो मैं तुम्हें ले जा सकता हूँ
और तुम्हें दरबार में राजा से भी मिलवा सकता हूँ, लेकिन वहाँ कुछ होने वाला नहीं है।”
रतन, “मैं कुछ समझा नहीं, मुखिया जी।”
मुखिया, “क्योंकि महाराज और जमींदार की बहुत अच्छी दोस्ती है। जमींदार ने महाराज की आँखों में झूठ और विश्वास की पट्टी बाँध रखी है।
महाराज उस पर बहुत विश्वास करते हैं। वह तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं करेंगे। हो सकता है तुम्हें उल्टी सजा देकर कारागार में बंद करवा दें।
अगर ऐसा हुआ तो तुम्हारे परिवार का क्या होगा, रतन? क्योंकि तुम्हारा कोई पुत्र भी नहीं है, जो तुम्हारी पीठ पीछे तुम्हारे परिवार को संभाल सके।”
रतन, “तो फिर अब मैं क्या करूँ?”
मुखिया, “देखो रतन, मेरे भी बहुत से खेत हैं। तुम चाहो तो अपने परिवार के साथ मेरे खेत में काम कर सकते हो।
और जितना मैं और मजदूरों को काम करने का धन देता हूँ, उससे तुम्हें थोड़ा ज़्यादा दे दूँगा। इससे ज़्यादा मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकता।”
रतन, “ठीक है। इस वक्त मुझे सिर्फ और सिर्फ काम की ही आवश्यकता है।”
उस दिन के बाद रतन मुखिया के खेतों पर काम करने लगा। रतन के साथ उसकी पत्नी और उसकी बेटी भी बराबर से काम कर रही थी।
एक दिन की बात है। रतन खेत में अपनी पत्नी और बेटी के साथ भोजन कर रहा था कि तभी वहाँ पर एक बहुत गंदा दिखने वाला इंसान आया।
व्यक्ति, “मैं कई दिनों से भूखा हूँ। क्या तुम मुझे कुछ खाने को दे सकते हो?”
झुमरी, “कौन हो तुम? और तुम्हारे कपड़े देख कर लग रहा है जैसे तुम कई महीनों से नहीं नहाए हो।”
साक्षी, “और तुम्हारे अंदर से कितनी बदबू आ रही है।”
व्यक्ति, “एक भूखे को भोजन खिलाना बहुत बड़ा पुण्य का काम होता है और मैं कुछ भी मुफ्त में नहीं खाता।
अगर मैं तुम्हारा भोजन खाऊँगा, तो उसके बदले मैं तुम्हें वो दूँगा जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते।”
रतन, “अरे भाई! अगर तुम्हें भोजन खाना है तो ऐसे ही माँग लो ना। तुम्हारे पास पहनने को ढंग के वस्त्र भी नहीं हैं और तुम कुछ देने की बात कर रहे हो?”
रतन ने उस गंदे दिखने वाले इंसान को दो रोटियाँ पकड़ा दीं और वो इंसान उन्हें खा गया।
व्यक्ति, “मुझे और भूख लगी है। क्या मुझे और दे सकते हो?”
साक्षी और झुमरी को ना जाने क्यों उस पर तरस आ गया? उन्होंने अपने हिस्से का सारा भोजन उस इंसान को दे दिया और वो सारा भोजन खा गया।
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रतन, “हेलो भाई! तुम तो हमारा सारा भोजन खा गए। अब तुम इसके बदले में हमें क्या दे सकते हो?”
रतन ने इतना कहा ही था कि तभी उस व्यक्ति ने जमीन से गीली मिट्टी उठा ली। उसने झुमरी और रतन के पसीने की कुछ बूँदें उस मिट्टी में मिला दीं
और उस मिट्टी से एक सुंदर दिखने वाले लड़के का पुतला बना दिया।
व्यक्ति, “ये लो, इसे धूप में सुखा देना और रात में अपने दरवाजे के पास रख देना।”
इतना कहकर वो व्यक्ति वहाँ से चला गया।
झुमरी, “मुझे तो ये कोई पागल लगता था, जी। ये क्या कहकर गया? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया।”
साक्षी, “लेकिन माँ, इसने मिट्टी से पुतला कितना सुंदर बनाया है। पिताजी, देखो ना कितना सुंदर लड़के का पुतला है?”
झुमरी, “अगर हमारा कोई पुत्र होता तो शायद कुछ इसी तरह का दिखता।”
झुमरी और रतन अपने-अपने काम पर लग गए, मगर साक्षी ने उस गीली मिट्टी के पुतले को धूप में रख दिया और वो उसे देखती रही।
कुछ घंटे बाद वह सूख गया। रात के समय साक्षी ने उसे अपने घर के दरवाजे पर रख दिया।
रतन, “अरे बेटी! ये तुम क्या कर रही हो?”
साक्षी, “पिताजी, आपने सुना नहीं था उस व्यक्ति ने क्या कहा था?”
झुमरी, “अरे! वो कोई पागल था। तुम भी उसकी बातें सुनकर ऊलजलूल हरकतें करने लगी। अब सो जाओ, सुबह जल्दी उठना है।”
साक्षी चारपाई पर लेट गई, मगर उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी।
अचानक आधी रात को बहुत सी रंग-बिरंगी किरणें उस मिट्टी के पुतले के आसपास मंडराने लगीं। साक्षी दौड़ते हुए रतन और झुमरी के पास पहुँची।
साक्षी, “माँ-पिताजी, उठिए… देखिए ना, ये क्या हो रहा है?”
झुमरी की बात सुनकर वे दोनों आँखें मसलते हुए उठ गए।
रतन, “ये क्या हो रहा है?”
झुमरी, “मुझे तो अब डर लगने लगा है, जी। आखिर वो पागल इंसान क्या देकर गया है?”
झुमरी ने इतना कहा ही था कि तभी देखते ही देखते वो मिट्टी का पुतला एक सुंदर 20 वर्षीय नवयुवक में परिवर्तित हो गया।
रतन, झुमरी और साक्षी उसे देखकर बुरी तरह से डर गए।
नवयुवक, “घबराओ मत पिताजी और माँ, मैं तुम्हारा ही बेटा हूँ — एक जादुई बेटा।”
झुमरी, “ऐसा कैसे हो सकता है?”
नवयुवक, “क्यों नहीं हो सकता? आपके पसीने का अंश मुझमें है।
मैं भले ही आपकी कोख में नौ महीने न रहा हूँ, लेकिन मैं आपका ही पुत्र हूँ।”
ना जाने क्यों, झुमरी के दिल में उसे देखकर ममता फूट पड़ी और वह दौड़ते हुए उस युवक से लिपट गई?
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झुमरी, “पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कि तुम मेरी असली संतान हो?”
नवयुवक, “मैं ही तुम्हारा असली संतान हूँ, माँ। अब तुम सबको चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। आज से मैं इस परिवार का बोझ संभालूँगा।”
रतन, “मेरा हमेशा से एक सपना था कि अगर कोई मेरा पुत्र होता तो मैं उसका नाम चंदू रखता। आज से तुम्हारा नाम चंदू है।
लेकिन तुम अभी कुछ दिनों तक घर से बाहर मत निकलना बेटा, नहीं तो गाँव वाले तरह-तरह के सवाल करेंगे।”
कुछ दिनों तक चंदू सबके साथ रहकर घुल-मिल गया। अब सभी लोग उसे अपना परिवार का सदस्य समझने लगे।
कुछ दिनों बाद रतन चंदू को खेत पर काम के लिए लेकर गया।
मुखिया, “अरे रतन! तुम्हारे साथ यह सुंदर नवयुवक कौन है?”
रतन, “यह मेरा पुत्र है।”
मुखिया, “पुत्र..? अरे भाई! जहाँ तक मैं जानता हूँ, तुम्हारा तो कोई पुत्र नहीं है। यह रातों-रात पुत्र कहाँ से आ गया?”
रतन, “ईश्वर चाहे तो सब कुछ हो सकता है, मुखिया जी। समझ लीजिए कि ईश्वर को मुझ पर दया आ गई और उसने मुझे एक पुत्र दे दिया।”
मुखिया, “तुम्हारा पुत्र तो दिखने में बहुत ही हट्टा-कट्टा और बलिष्ट है। रतन, फिर तुम्हें जमींदार से अब डरने की कोई जरूरत नहीं।”
इतना कहकर मुखिया वहाँ से चला गया।
चंदू, “पिताजी, मुखिया जी क्या बोलकर गए हैं?”
रतन, “छोड़ो चंदू, जाने दो। तुम इन सब बातों में मत पड़ो।”
चंदू, “नहीं पिताजी, आपको मुझे बताना ही होगा। आखिरकार मैं आपका बेटा हूँ और एक बेटे को अपने पिता की हर बात जानने का अधिकार होता है।”
रतन ने सारी घटना चंदू को बता दी।
चंदू, “अच्छा… तो इसका मतलब ये है कि मेरे पिता की ज़मीन पर जमींदार ने कब्जा कर रखा है? आप चलिए मेरे साथ।”
रतन, “लेकिन चंदू, तुम नहीं जानते जमींदार बहुत ही दुष्ट और मतलबी व्यक्ति है और बहुत शक्तिशाली भी है।”
चंदू, “मेरे पास भी शक्ति की कोई कमी नहीं है, पिताजी। लगता है आपको मेरी ताकत का अंदाज़ा नहीं है।
चलिए आप मेरे साथ। जब हमारा खेत स्वयं मौजूद है तो हम दूसरों के खेत में काम क्यों करें?”
चंदू पूरे परिवार को लेकर अपने खेत पर ले गया।
अचानक रतन, झुमरी, साक्षी और चंदू को देखकर जमींदार हैरत में पड़ गया।
जमींदार, “तुम यहाँ पर क्या कर रहे हो, रतन?”
रतन के कुछ कहने से पहले ही चंदू जमींदार की आँखों में आँखें डालकर बोला,
चंदू, “ये मेरे पिताजी हैं, ये मेरी माँ हैं और मैं इस लड़की का भाई हूँ। मैं अपने खेत में हल चलाने के लिए आया हूँ
और तुम सब लोगों को यहाँ से धक्के देकर बाहर निकालने के लिए आया हूं।”
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जमींदार, “ये क्या बचपना है, रतन? जहाँ तक मैं जानता हूँ, तुम्हारा कोई पुत्र नहीं है।”
रतन, “तो अब जान लो, ये मेरा ही पुत्र है।”
जमींदार, “आख़िर ये चल क्या रहा है? लेकिन अगर तुम सीधी तरह से इस खेत से नहीं गए, तो मुझे मजबूरन तुम सबको धक्के देकर यहाँ से बाहर निकालना पड़ेगा।”
चंदू, “वो तरीका भी आजमा कर देख लो, जमींदार। मैं तुम्हें कुछ समय का मोहलत देता हूँ। अपने आदमियों के साथ यहाँ से निकल जाओ।”
जमींदार, “शायद तुम नहीं जानते बच्चे, तुम्हारे पिताजी ने मुझसे कर्ज लिया था।”
चंदू, “मेरे पिताजी ने तुमसे जितना कर्ज लिया था, उससे कहीं ज्यादा तुम उनकी फसल छीनकर ले गए।
तुम्हारा कर्ज चुकता हो गया। अब तुम यहाँ से जा सकते हो।”
चंदू की बात सुनकर जमींदार का आदमी संपत क्रोधित हो गया। जैसे ही वह चंदू को मारने के लिए आगे बढ़ा,
चंदू ने एक मुक्का संपत के मुँह पर जड़ दिया। संपत वहीं बेहोश हो गया। ये देखकर जमींदार डर गया।
जमींदार, “मैं चुप नहीं रहूँगा। इस मामले को महाराज के पास लेकर जाऊँगा।”
चंदू, “जहाँ ले जाना है, वहाँ ले जाओ। मगर इस वक्त यहाँ से चले जाओ, नहीं तो महाराज के पास तुम अपनी दोनों टांगों पर चल कर नहीं जाओगे।”
जमींदार डरकर अपने सारे आदमियों को लेकर वहाँ से चला गया।
रतन, “बेटा, तुम शायद नहीं जानते कि जमींदार की महाराज से बहुत अच्छी दोस्ती है?”
चंदू, “जानता हूँ पिताजी, लेकिन शायद आप नहीं जानते होंगे कि झूठ चाहे जितना भी बलवान क्यों न हो, सत्य के आगे उसे झुकना ही पड़ता है।”
उस दिन के बाद चंदू खेत में हल चलाने लगा। चंदू के शरीर में एक गजब की फुर्ती और शक्ति थी।
जिसे गांव का कोई भी व्यक्ति देखता तो दंग रह जाता। मगर कुछ दिनों बाद, राजा के सैनिक अचानक रतन के घर पर आ धमके।
सैनिक, “तुम्हें अभी इसी वक्त महाराज के महल में चलना होगा। ये महाराज का आदेश है।”
रतन और चंदू उन सैनिकों के साथ सीधे राजमहल चले गए। राजमहल में राजा के बगल में जमींदार बैठा था।
राजा, “अच्छा तो तुम हो जिसने मेरे मित्र को सबके सामने अपमानित किया?”
चंदू, “मैंने आपके मित्र को अपमानित नहीं किया, राजन बल्कि आपके मित्र ने मेरे पिता के साथ धोखा किया है।”
राजा, “बकवास बंद करो, मैं सब जानता हूँ। तुम इस रतन के पुत्र नहीं हो।
मुझे जमींदार ने सब कुछ बता दिया है। रतन का पुत्र है ही नहीं, तो फिर तुम कौन हो?”
जमींदार, “महाराज, ये कोई जासूस है। इसे पकड़कर कारागार में बंद कर दीजिए। ये आपकी राजगद्दी के लिए खतरा है।”
राजा, “मेरा भी शक यही है। मैंने गाँव में अपने गुप्तचर भेजकर पता करवाया है और मुझे पता यही लगा है कि रतन का कोई पुत्र है ही नहीं।
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यह जरूर किसी दूसरे देश का जासूस है जो बहरूपिया बनकर मेरा राज्य मुझसे छीनने आया है।”
राजा ने इतना कहा ही था कि तभी उस राजमहल में अजीबो-गरीब रंग-बिरंगी किरणें मंडराने लगीं।
और देखते ही देखते उन किरणों में वही गंदा दिखने वाला व्यक्ति सबके सामने आ गया। वो अचानक एक साधु में परिवर्तित हो गया।
राजा, “कौन हैं आप?”
साधु, “मैं एक साधु हूँ, महाराज। रतन बिल्कुल सही कह रहा है। यह पुत्र उसी का है।”
राजा, “लेकिन साधु महाराज, रतन का तो कोई पुत्र है ही नहीं।”
साधु, “हाँ, यह सत्य है कि रतन का कोई पुत्र नहीं है। लेकिन रतन की गरीबी देख कर मुझे उस पर दया आ गई
और मैंने एक मिट्टी के पुतले में रतन और उसकी पत्नी का पसीना मिलाकर एक पुतला बनाया।
और उस पुतले में इन दोनों की पुत्र प्राप्ति की सच्ची श्रद्धा से जान आ गई। अब यह रतन का ही पुत्र है और जमींदार झूठा है।”
रतन, “हाँ महाराज, आपके मित्र ने आपका नाम लेकर समाज में डर और भय का माहौल बना रखा है। इसने बेईमानी से मेरा खेत मुझसे छीन लिया था।”
राजा क्रोधित होकर जमींदार से बोला,
राजा, “क्या ये सही है?”
जमींदार, “मुझसे गलती हो गई, मुझे क्षमा कर दीजिए महाराज।”
राजा, “इस धोखे के लिए तुम सजा के अधिकारी हो।”
राजा, “सिपाहियों, इस कपटी को कारागार में बंद कर दो।”
जमींदार, “क्षमा महाराज, क्षमा!”
राजा (रतन से), “रतन, मैं तुम सब का क्षमा प्रार्थी हूं। अब तुम राज्य में अपने परिवार सहित सुखी जीवन यापन करो।”
रतन, “धन्यवाद महाराज!”
इसके बाद रतन अपने परिवार के साथ खेती कर खुशी खुशी रहने लगा।
किसी ने सच ही कहा है… ‘झूठ चाहे कितना भी बलवान क्यों ना हो, उसका पतन पक्का है।’
दोस्तो ये Rahasyamay Kahani आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!