जादुई मैगीवाला | JADUI MAGGIWALA | Jadui Kahani | Megical Stories | Jadui Stories in Hindi

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हेलो दोस्तो ! कहानी की इस नई Series में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – ” जादुई मैगीवाला ” यह एक Jadui Hindi Kahani है। अगर आपको Jadui Stories, Jadui Kahani या Magical Kahaniyan पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।


पहाड़ों की रानी कहे जाने वाले शहर शिमला में अरुण नाम का एक आलसी कामचोर लड़का रहता था।

रुद्र सिंह, “अरे ओ कामचोर! जरा घड़ी तो देख, 11 बज चुके हैं और तू अभी भी बिस्तर में ही पड़ा है।”

अरुण, रुद्र सिंह की बात को अनसुनी करके फिर से करवट बदलकर सो जाता है।

रुद्र सिंह, “मैं तो तंग आ गया इस लड़के से, रोज-रोज इसकी कामचोरी बढ़ती ही जा रही है।”

रुद्र सिंह पानी की बाल्टी लेकर अरुण के ऊपर डालता है।

अरुण, “क्या बापू, सोने भी नहीं देते। 11 ही तो बजे हैं और वैसे भी मैं उठकर कौन सा तीर मार लूंगा?”

रुद्र सिंह, “अरे! इसीलिए तो उठा रहा हूं कि आज तुझे भी मैं मेरे साथ काम पर ले जाकर ही रहूंगा।”

अरुण, “क्या काम… और मैं? आपका दिमाग तो ठिकाने पर है? और वैसे भी बाप के होते हुए बेटा काम करे, शोभा देता है क्या?”

रुद्र सिंह, “अरे मेरी फूटी किस्मत! अरे तेरे जैसा बेटा मिलने से तो अच्छा था कि मुझे कोई औलाद ही ना होती। सिर्फ मुझे पता है कि मैं तुझे कैसे झेलता हूं?”

अरुण, “अरे! तो आपको कहा ही किसने मुझे झेलने के लिए, बताओ?”

रुद्र सिंह, “देखना, जिस दिन मैं नहीं रहा ना, देखना उस दिन तुम बहुत पछताओगे।”

अरुण, “अरे! क्या पछताऊंगा-पछताऊंगा, दिन भर ताने ही मारते रहते हो। किसी दिन आपसे परेशान होकर मैं खुद ही घर छोड़कर चला जाऊंगा, समझे? फिर आपको मेरी अहमियत समझ में आएगी।”

रुद्र सिंह, “अच्छा, घर छोड़कर जाएगा?”

वह उसका हाथ पकड़कर घर से बाहर निकाल देता है।

अरुण, “अरे-अरे-अरे, क्या कर रहे हो? बुढ़ापे में सठिया गए हो क्या?”

रुद्र सिंह, “तुझे घर छोड़कर जाना था ना? अब जा और खबरदार अगर मेरे घर में तूने एक कदम भी रखा तो तेरी टांगे तोड़ दूंगा मैं।”

अरुण, “ठीक है, तो मैं भी अब कभी भी आपके घर पर कदम नहीं रखूंगा।”

रुद्र सिंह, “मुझे भी कोई जरूरत नहीं है तेरे जैसे निकम्मे बेटे की। जा निकल जा मेरे घर से और कभी मुझे अपनी शक्ल भी मत दिखाना, समझा?”

अरुण गुस्से में वहां से चला जाता है।

अरुण, “अब मैं कभी भी उस खूसट बुड्ढे के घर पर नहीं जाऊंगा, चाहे जमीन-आसमान एक ही क्यों ना हो जाए?  

अबमैं इतनी दूर चला जाऊंगा कि वह बुड्ढा चाहे तो भी मुझे नहीं ढूंढ पाएगा। पर उन्हें मेरे होने ना होने से क्या फर्क पड़ता है, उन्हें तो अपने काम से ही मतलब है।  

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और वैसे भी मैं अब तंग आ चुका था उनकी रोज-रोज की चिकचिक से। अच्छा ही हुआ उन्होंने मुझे घर से बाहर निकाल दिया, नहीं तो किसी दिन मैं ही भाग जाता।”

अरुण चलते-चलते पहाड़ी पर एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ जाता है।

अरुण, “आहा, क्या नजारा है! अब मैं बस यहां आराम से आराम कर सकता हूं और मुझे कोई भी परेशान नहीं कर सकता।”

थोड़ी देर बाद उसे कुछ लोगों की आवाज सुनाई पड़ती है।

अरुण, “ओ तेरी, ये लोग यहां मेरी नींद खराब करने क्यों आए हैं? और इतने सारे लोग?”

राहगीर 1, “अरे भाई, अरे ओ भाई, तुम यहां क्या कर रहे हो?”

राहगीर 2, “अरे भाई, मैंने इस जगह का बड़ा नाम सुन रखा था। यहां पर हर रोज बहुत से लोग आते हैं, तो मैंने सोचा कि क्यों ना आज हम भी घूमने चलें?”

अरुण, “क्या यहां पर इतने सारे लोग हर रोज आते हैं और मुझे कानों-कान खबर नहीं? खैर मुझे क्या? अभी तो मुझे बहुत तेज भूख लग रही है।”

फिर वह खाने की तलाश में इधर-उधर जाता है।

अरुण, “अरे भैया! एक गरमागरम समोसा और आधा किलो जलेबी बांध दो।”

दुकानदार, “हां-हां, ये लो भैया। आपके 100 रुपये हुए।”

अरुण, “अरे! पर पैसे तो मेरे पास नहीं हैं।”

दुकानदार, “अच्छा पैसा नहीं है। ये दुकान क्या तेरे अब्बा की है जो तू मुफ्त में खाने आ गया बे?”

अरुण, “अरे भैया! मेरे तो अब्बा भी मुझे मुफ्त में खाना नहीं देते।”

अरुण वहां से थोड़ी दूर जाता है। थोड़ी दूर जाकर उसे एक घर दिखाई देता है।

अरुण, “अरे भाई! कुछ खाने को मिलेगा क्या?”

आदमी, “अरे ओ, भीख मांगनी है तो कहीं और जाकर मांग। इतना हट्टा-कट्टा तो है, कुछ काम-धाम ही कर ले। आ जाते हैं सुबह-सुबह मुंह उठाकर।”

अरुण, “अच्छा ठीक है भाई, खाना नहीं तो कम से कम थोड़ा पानी पिला दो।”

आदमी, “ठीक है।”

पानी पीकर वह वापस पहाड़ पर चला जाता है।

अरुण, “कितना भटका पर कोई भी मदद करने के लिए तैयार नहीं है? बापू सच ही कहते थे कि ये दुनिया ऐसी नहीं है जैसे हम सोचते हैं।  

यहांजब तक किसी को काम नहीं पड़ता तब तक कोई किसी की मदद नहीं करता।”

दो दिन बाद…

अरुण, “आज तो दो दिन हो गए, पेट में कुछ भी नहीं गया। अगर आज और मैंने कुछ नहीं खाया तो मैं तो बिना मौत के ही मर जाऊंगा।  

एककाम करता हूं, आज मैं किसी की थोड़ी-बहुत मदद कर दूंगा तो वह कम से कम मुझे एक वक्त का खाना तो दे देगा। हां-हां, यही सही है।”

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फिर वह खाने की तलाश में पहाड़ी से नीचे गांव में जाता है और उसे एक बूढ़ी औरत दिखाई देती है जो गिर पड़ी है।

अरुण, “अरे अम्मा! क्या हुआ? मैं तुम्हारी मदद किए देता हूं।”

वह उन्हें घर छोड़कर उनकी खाट के पास बैठ जाता है।

अरुण, “अम्मा क्या हुआ, अचानक तुम गिर कैसे गई?”

बूढ़ी औरत, “अरे बेटा! कुछ नहीं, वो बस थोड़ा चक्कर आ गया था।”

अरुण, “आपके बेटे और बहू दिखाई नहीं दे रहे?”

बूढ़ी औरत, “वो कहीं काम से गए हैं।”

अरुण, “अच्छा, उनके आने तक मैं यहीं रुक जाता हूं। …अच्छा अम्मा, कुछ खाने को मिलेगा?”

बूढ़ी औरत, “बेटा, मेरे पास तो बस इतने ही पैसे हैं, इसमें जो भी मिले वो ले आना।”

अरुण, “सिर्फ 20 रुपये? इसमें क्या आएगा? हां, एक काम करता हूं, मैं मैगी लेकर आ जाता हूं। वैसे भी जोरों की भूख लग रही है तो जल्दी भी बन जाएगी और पेट भी भर जाएगा।”

मैगी लाने के बाद…

अरुण, “अरे अम्मा, तुम्हारी तबीयत…?”

बूढ़ी औरत, “बेटा मुझे तो आदत है, ला क्या लेकर आया है?”

अरुण, “अम्मा, मैगी।”

बूढ़ी औरत, “ला मैं फटाफट मैगी बना देती हूं।”

अरुण, “हां अम्मा, बहुत जोर से भूख लग रही है। हम दोनों मजे से खाएंगे।”

अरुण मैगी बनाने में बूढ़ी अम्मा की मदद करता है और बूढ़ी अम्मा बातों ही बातों में उसे मैगी बनाना सिखा देती है।  

बूढीऔरत मैगी बना देती है और दोनों मैगी के साथ-साथ चाय का भी आनंद लेते हैं।

अरुण, “अरे वाह अम्मा! क्या मैगी बनाई है! ऐसी मैगी तो मैंने आज तक नहीं खाई।”

फिर दोनों मज़े से चाय और मैगी खाते हैं। अरुण एक-दो दिन उस बूढी औरत के साथ रहकर उसकी सेवा करता है।

अगले दिन…

अरुण, “अच्छा अम्मा, अब आप ठीक तो हैं ना?”

बूढ़ी औरत, “हां-हां बेटा, अब मैं बिल्कुल ठीक हूं।”

अरुण, “अच्छा तो अम्मा, अब मैं चलता हूं।”

बूढ़ी औरत, “रुक जा बेटा, जाने से पहले मैं तुझे कुछ देना चाहती हूं।”

अरुण, “क्या अम्मा ?”

बूढ़ी औरत, “ये ले बेटा, इसमें खास तरह का जादू मसाला है। इसे बस चुटकी भर किसी भी व्यंजन में डालेंगे तो उसका स्वाद चार गुना बढ़ जाएगा।”

अरुण, “अच्छा ठीक है अम्मा, अपना ध्यान रखना, अब मैं चलता हूं।”

अरुण फिर से वापस पहाड़ी पर चला जाता है।

अरुण, “आहा! इसमें से तो बहुत ही अच्छी खुशबू आ रही है। पर इतने मसाले को लेकर क्या मैं ढाबा खोलूंगा?,

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हां ये तो बहुत ही अच्छा आइडिया है। पर ढाबा किस चीज का खोलूं? वैसे भी मुझे तो कुछ बनाना ही नहीं आता।  

अरेहां, अम्मा ने मुझे मैगी बनानी सिखाई तो थी और वैसे भी उसमें ज्यादा मेहनत भी नहीं होती और यहां आसपास कोई मैगी की दुकान भी नहीं है।”

फिर अरुण अपने हाथों की चांदी की अंगूठी बेच देता है और आस-पास की लकड़ियां और टेंट का जुगाड़ करने के बाद मैगी और चाय की दुकान खोलता है। और अरुण की दुकान पर एक आदमी आता है।

आदमी, “अरे भाई! एक प्लेट चाय-मैगी लगाना।”

अरुण, “अरे हां-हां, अभी लगाता हूं।”

आदमी, “अरे वाह भाई! कुछ भी कहो पर ऐसी जगह पर चाय और मैगी खाने का तो मजा ही अलग है।”

एक दो दिन तो उसकी दुकान अच्छे से चलती है। पर  तीसरे दिन अचानक बहुत तेज हवा चलने लगती है और उसका टेंट उड़ जाता है।

अरुण, “अरे अरे! मेरा टेंट।”

फिर अगले दिन व ऐसे ही खुले आसमान में अपनी दुकान डाल लेता है।

अरुण, “अब हवा आए तो आने दो, मुझे कोई फिक्र नहीं। ना टेंट उखड़ने की समस्या और ना ही कुछ।”

अचानक से घने बादल छा जाते हैं और बारिश शुरू हो जाती है।

अरुण, “अरे! थोड़ी देर पहले तक तो मौसम पूरा साफ था अचानक बारिश मेरा पूरा खाना खराब कर दिया। 

हे प्रभु! यह कौन सी परीक्षा ले रहा है तू? कहां मैं ऐसे आराम से अपनी जिंदगी जीता था और अब एक एक पैसे के लिए तरसना पड़ रहा है।”

फिर वह अपना बच्चा खुचा सामान लेकर पास ही के घर में मदद मांगने पहुंच जाता है।

अरुण, “अरे भाई साहब! मुझे बारिश बंद होने तक क्या आप अपने घर में जगह दे सकते हैं?”

मकान मालिक, “अरे हां भाई, क्यों नहीं?”

अरुण उस आदमी के घर में आ जाता है।

अरुण, “अरे भाई! यहां एक अम्मा रहती थीं, नजर नहीं आ रहीं। तुम उनके बेटे हो ना?”

मकान मालिक, “हां-हां भाई, पर तुम उन्हें कैसे पहचानते हो?”

अरुण, “कुछ दिन पहले उनकी तबीयत खराब हो गई थी, तो मैं एक-दो दिन उन्हीं के पास रहा था।”

मकान मालिक, “अच्छा, तो वो तुम ही थे जिसने मेरी मां का इतना ध्यान रखा था? गांव वालों ने मुझे बताया तो था।”

अरुण, “हां, कहां हैं अम्मा? मुझे उन्हें कुछ बताना है और उनकी तबीयत तो ठीक है ना? अम्मा ओ अम्मा…।”

मकान मालिक, “अब तुम चाहकर भी उन्हें कुछ नहीं बता सकते। कुछ दिन पहले ही उनका देहांत हो गया।”

अरुण, “क्या? देहांत हो गया?”

मकान मालिक, “मैं किसी काम से बाहर गया था और जब वापस आया तो अगले दिन ही अम्मा की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई।  

आसपासके लोगों ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया था। मैंने तो सोचा ही नहीं था कि मैं तुमसे मिल भी पाऊंगा या नहीं। 

परतुम, तुम यहां पहाड़ी पर क्यों रहते हो और कहां से आए हो? अरे वाह! आइडिया तो तुम्हारा बहुत अच्छा है।  

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वैसे भी यहां पर बहुत से लोग आते-जाते रहते हैं और आसपास कोई मैगी की दुकान भी नहीं है, तो दुकान तो तुम्हारी बढ़िया चलेगी।”

तभी उस आदमी की छोटी सी बेटी वहां आ जाती है।

बेटी, “पापा-पापा, मुझे भी मैगी खानी है।”

मकान मालिक, “अरे बेटा! अब इतनी बारिश में मैं तुम्हारे लिए मैगी कहां से लेकर आऊं?”

अरुण, “अरे भाई साहब! मेरे पास जो है थोड़ी सी मैगी बची है, आप इस बच्ची को वो खिला दीजिए।”

बेटी, “पापा, आप भी खाकर देखिए।”

फिर वह लड़की अपने पापा को भी मैगी खिलाती है।

मकान मालिक, “अरे वाह! ऐसी मैगी तो मैंने आज तक कभी नहीं खाई। अरे भाई! अब तो तुम्हारे यहां मेरा रोज ही आना-जाना होगा।”

अरुण, “नहीं-नहीं भाई, अब मैं कुछ नहीं करने वाला। बस बहुत हुआ, मैं कितनी भी कोशिश करता हूं, पर इस पहाड़ पर दुकान टिकती नहीं।”

मकान मालिक, “अरे नहीं भाई! मैं सच कहता हूं, ऐसी मैगी तो पूरे शहर भर में नहीं मिलेगी।  

तुम कहो तो मैं तुम्हारी कुछ मदद कर देता हूं। वैसे भी तुमने मेरी मां की बहुत सेवा की थी।”

अरुण (मन में), “वैसे बात तो सही है। अगर मैं मैगी की दुकान नहीं खोलूंगा तब भी मुझे कोई ना कोई काम तो अपने लिए ढूंढना ही पड़ेगा और इतनी ज्यादा मेहनत… ना बाबा ना।  

एक काम करता हूं इसकी बात मानकर पैसे ले लेता हूं और एक छोटी सी दुकान खोलकर अपना काम आगे बढ़ाता हूं।”

अरुण, “ठीक है भाई, पर तुम्हें मेरी दुकान पर अपनी बेटी को लेकर हर रोज आना पड़ेगा।”

मकान मालिक, “अरे नहीं भाई! अगर रोज-रोज इसे लेकर आया तो इसकी आदत खराब हो जाएगी।”

और दोनों हसने लगते हैं। फिर अरुण उसकी मदद ले लेता है और कुछ ही दिन में एक छोटी सी दुकान तैयार कर लेता है।  

धीरे-धीरे उसकी दुकान अच्छी खासी चलने लगती है। पहाड़ी पर आने वाले लोग उसके हाथों की चाय और मैगी खाए बिना नहीं जाते। एक दिन अरुण की दुकान पर कुछ आदमी आते हैं।

आदमी, “अरे भाई! एक मैगी और चाय लगाना, मैं बहुत दूर से तुम्हारी दुकान की तारीफ सुनकर आया हूं।”

अरुण बूढ़ी औरत के दिए हुए जादुई मसाले से मैगी बनाता है।

आदमी, “अरे भाई! खुशबू इतनी अच्छी आ रही है तो सोचो कि मैगी कितनी अच्छी होगी?”

फिर अरुण सभी को मैगी देता है।

आदमी, “अरे वाह भाई! जितना सुना था ये मैगी तो उससे भी ज्यादा स्वादिष्ट है,भैया। अगले महीने मेरी बेटी का बर्थडे है, तो मैं उसके जन्मदिन पर भी तुम्हारे हाथ की मैगी का स्टॉल लगवाऊंगा।”

अरुण खुश हो जाता है। कुछ दिनों बाद अम्मा का बेटा भी अरुण की दुकान पर आता है। अरुण उसे देखकर तुरंत पहचान जाता है।

अम्मा का बेटा, “अरे भाई साहब! अपने हाथों की गरमा-गरम एक प्लेट चाय और मैगी लगाना।  

वह गुड़िया तो आज ज़िद पर ही अड़ गई थी कि उन अंकल के हाथों की मैगी ही खानी है; तो क्या था फिर, मैं ले आया उसे।”

अरुण, “अरे! अच्छा किया भाई साहब! वैसे भी बहुत दिनों से मैं आपसे मिलने की सोच रहा था।”

अरुण उस आदमी को चाय और मैगी देता है।

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अम्मा का बेटा,”अरे अरुण भाई! यह तो और भी ज़्यादा लाजवाब है।”

फिर अरुण उस आदमी को उसके पैसे लौटा देता है।

अरुण, “यह लो भाई, तुम्हारी अमानत। धन्यवाद! अगर उस दिन आप मेरी मदद नहीं करते, तो मैं यहाँ तक नहीं पहुँच पाता।”

अम्मा का बेटा, “अरे भाई! इसमें धन्यवाद की क्या बात है? आपने मेरी माँ की इतनी सेवा की, तो इसके आगे तो मेरी मदद कुछ भी नहीं।”

अरुण की दुकान अब आसपास के गाँवों में फेमस हो गई थी। उसने अब अपनी दुकान में अलग-अलग तरह की मैगी बनाना शुरू कर दी थी  

और धीरे-धीरे करके उसने एक ढाबा बना लिया। अब उसने अपनी मदद के लिए कुछ आदमी भी लगा लिए थे।

एक दिन…

अरुण, “कहाँ मेरी ज़िंदगी बिल्कुल निकम्मे जैसी थी और आज मैं एक ढाबे का मालिक हूँ! बापू सही कहते थे, पर अब उनके सामने जाने की हिम्मत ही नहीं होती। सच में, उनकी बहुत याद आती है।”

थोड़ी देर बाद, जब वह ढाबे में कुछ लोगों को मैगी और चाय दे रहा था, तब वह कुछ लोगों की बातें सुनता है…

पहला आदमी, “अरे भाई! सुना तूने, पास के मंदिर में एक आदमी और औरत अपने बेटे को वापस पाने के लिए चार दिनों से भूखे-प्यासे ही पड़े हैं। बेचारे कहीं के…।”

दूसरा आदमी, “अरे भाई, काहे का बेचारा? पहले तो उसने खुद ही अपने बेटे को घर से बाहर निकाल दिया और अब उसे ढूँढने के लिए मन्नत माँग रहा है।”

पहला आदमी, “अरे भाई! पर सुना है कि वो लड़का कोई कामकाज नहीं करता था, इसीलिए गुस्से में आकर उसके बाप ने निकाला था।”

अरुण, “कहीं पिताजी तो…?”

अरुण दौड़ता हुआ उस मंदिर में जाता है। मंदिर पहुँचकर वह एक आदमी और औरत को देखता है, जो भूखे-प्यासे मंदिर में बैठे थे।

अरुण अपने पिता के पास जाकर उन्हें गले से लगा लेता है। रुद्र सिंह और अरुण, दोनों की आँखों में आँसू होते हैं। रुद्र सिंह खड़ा होकर अरुण को गले से लगा लेता है

रुद्र सिंह, “मुझे माफ कर दे मेरे बच्चे, मैंने तुझे दर-बदर की ठोकरें खाने के लिए घर से बाहर निकाल दिया।”

अरुण, “नहीं बापू, अगर उस दिन आप मुझे नहीं निकालते तो मैं इतने बड़े ढाबे का मालिक ना होता। मुझे माफ कर दो बापू, मैंने आपकी बात नहीं मानी।”

रुद्र सिंह, “क्या? ढाबे का मालिक?”

अरुण, “हां-हां बापू, मैंने पहाड़ पर एक मैगी का ढाबा खोला है।”

और फिर वह रुद्र सिंह को सारी बातें बताता है।

रुद्र सिंह, “मैंने तुझे कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा! चल, अब घर चल।”

अरुण, “अरे बापू! पर आप पहले मेरे ढाबे पर तो चलिए।”

फिर अरुण अपनी माँ और बापू को ढाबे पर लेकर जाता है।

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रुद्र सिंह, “अरे वाह बेटा! इतना बड़ा ढाबा? क्या यह तेरा है?”

अरुण, “हाँ बापू, हाँ। यह मैंने अपनी मेहनत से खड़ा किया है। मुझे हर पल आपकी बहुत याद आई।”

फिर रुद्र सिंह अरुण को गले से लगा लेता है।

रुद्र सिंह, “मुझे तुझ पर गर्व है मेरे बच्चे। अब चल घर चल, तेरे बिना घर जैसे काटने को दौड़ता है।”

अरुण की मां, “हां। देख, कितना दुबला हो गया है?”


दोस्तो ये Magical Hindi Story आपको कैसी लगी, नीचे Comment में हमें जरूर बताइएगा। कहानी को पूरा पढ़ने के लिए शुक्रिया!


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